Thursday, May 13, 2021
कामधेनु गौ माता आरती
ॐ जय कामधेनु गौ माता, मैया जय जय गौ माता ।
तुमको हरदिन सेवत, हर देव गण त्राता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता.
नन्दा - सुभद्रा - सुरभि, सुशीला - बहुला जगमाता ।
सूर्य - चन्द्रमा - ध्यावत, सर्व देव गाता।। ॐ जय
कामधेनु गौ माता....
विश्व रूप तुम हो, सुख सम्पति दाता ।
जो कोइ तुमको पूजत, दुख दरिद्र नही आता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....
तीनों लोक निवासिनी, अभय दान दाता ।
सर्व धर्म की मैया, पाप - ताप - हरता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....
तुम जिस घर रहती हो, अन्न-धन्न आता ।
सब के आदर पाकर, गो भक्त बन जाता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....
तुम बिन यज्ञ न होते, दविष्य न हो पाता ।
दूध दही गौलोवन, सब तुम से आता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....
कामधेनु - तुम ही कहलाती, जग में ज्योत जलाती ।
खान - पान का वैभव, सब तुमसे आता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....
गौ माता जी की आरती, जो कोर्इ नर गाता ।
उल्लास भरे ह्रदय से, सुख - आनंद पाता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....
ॐ जय कामधेनु गौ माता ।।
माँ वैष्णो आरती
तुमरे भवन पर ज्योत जागे ज्योत जागे रे मेरे पाप भागे
आनंद मंगल हो रही मेरी अम्बा..
ब्रह्मा जी वैद पड़ें तेरे द्वारे शंकर ध्यान लगाये मैया के द्वार्वे
शंकर ध्यान लगाये मेरी अम्बा..
नारद नृत्य करे तेरे द्वारे काहना बीन बजाये मेरी मैया के द्वार्वे ,
काहना बीन बजाये मेरी अम्बा..
पंच-रंग सुआ चोला अंग बीराजे लाल किनारी लगाये मेरी मैया के चोला,
लाल किनारी लगाये मेरी अम्बा
गल फूलों के हार बीराजे केसर तिलक लगाये मेरी मैया के माथे ,
केसर तिलक लगाये मेरी अम्बा
सर सोने दा छत्र बीराजे हीरे रतन जडये मेरी मेरी मैया के छत्र ,
हीरे रतन जडये मेरी अम्बा..
बावन वीर चोंसंठ संग योजन भेरों चवर झुलाये मेरी मैया के द्वारे,
भेरों चवर झुलाये मेरी अम्बा
लोंक्ड-वीर भवन के आगे गोरख नाद बजाये मेरी मैया के द्वारे,
गोरख नाद बजाये मेरी अम्बा..
सिमर-चरण तेरा ध्यानु यश गाये बानेकाज निभाए मेरी मैया के बाने,
बानेकाज निभाए मेरीअम्बा
आनंद मंगल हो रही मेरी अम्बा,आनंद मंगल हो रही मेरी अम्बा,
आनंद मंगल हो रही मेरी अम्बा !!
ॐ जय नरसिंह हरे, प्रभु जय नरसिंह हरे।
स्तम्भ फाड़ प्रभु प्रकटे, स्तम्भ फाड़ प्रभु प्रकटे, जन का ताप हरे॥ १ ॥
ॐ जय नरसिंह हरे॥
तुम हो दीन दयाला, भक्तन हितकारी, प्रभु भक्तन हितकारी।
ॐ जय नरसिंह हरे॥
सबके ह्रदय विदारण, दुस्यु जियो मारी, प्रभु दुस्यु जियो मारी।
दास जान अपनायो, दास जान अपनायो, जन पर कृपा करी॥ ३ ॥
ॐ जय नरसिंह हरे॥
ब्रह्मा करत आरती, माला पहिनावे, प्रभु माला पहिनावे।
शिवजी जय जय कहकर, पुष्पन बरसावे॥ ४ ॥
ॐ जय नरसिंह हरे॥
॥ इति आरती श्री नरसिंह भगवान सम्पूर्णम ॥
जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा ।
जय काली और गौरा देवी कृत सेवा ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥
तुम्ही पाप उद्धारक दुःख सिन्धु तारक ।
भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥
वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी ।
महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥
तुम बिन सेवा देवा सफल नहीं होवे ।
चौमुख दीपक दर्शन सबका दुःख खोवे ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥
तेल चटकि दधि मिश्रित भाषावलि तेरी ।
कृपा करिये भैरव करिये नहीं देरी ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥
पाव घूंघरु बाजत अरु डमरु डमकावत ।
बटुकनाथ बन बालकजन मन हरषावत ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥
बटुकनाथ की आरती जो कोई नर गावे ।
कहे धरणीधर नर मनवांछित फल पावे ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥
॥ इति भैरव आरती सम्पूर्णम ॥
Saturday, April 10, 2021
ॐ जय श्री श्याम हरे,
प्रभु जय श्री श्याम हरे।
निज भक्तन के तुमने
पूरन काम करे।
॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥
गल पुष्प की माला,
सिर पर मुकुट धरे
पीत बसन पीताम्बर,
कुण्डल कर्ण पड़े
॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥
रत्न सिंहासन राजत,
सेवक भक्त खड़े
खेवत धूप अग्नि पर,
दीपक ज्योति जड़े
॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥
मोदा खीर चूरमा ,
सुवर्ण थाल भरे
सेवक भोग लगावत
सिर पर चंवर ढुरे
॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥
झांझ नगाड़ा और घड़ि़यावल,
शंख मृदंग धुरे।
भक्त आरती गावे,
जय-जयकार करे॥
॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥
जो ध्यावे फल पावे,
सब दुःख से उबरे।
सेवक जन निज मुख से,
श्री श्याम-श्याम उचरे॥
॥ हरि ॐ जय श्री श्याम हरे ॥
‘श्री श्याम बिहारीजी’ की आरती,
जो कोई नर गावे।
कहत ‘दासकमल’ स्वामी,
मनवांछित फल पावे॥
॥ इति श्री खाटू श्याम आरती ॥
सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी,
कोई तेरा पार ना पाया ।
पान सुपारी ध्वजा नारियल,
ले तेरी भेट चढ़ाया
॥ सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी ॥
सुवा चोली तेरी अंग विराजे,
केसर तिलक लगाया
॥ सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी ॥
नंगे पग माँ अकबर आया,
सोने का छत्र चढ़ाया
॥ सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी ॥
उँचे पर्वत बन्यो देवालय,
नीचे शहर बसाया
॥ सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी ॥
सतयुग, द्वापर, त्रेता मध्ये,
कलयुग राज सवाया
॥ सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी ॥
धूप दीप नैवेद्य आरती,
मोहन भोग लगाया
॥ सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी ॥
ध्यानू भगत मैया तेरे गुण गाया,
मनवांछित् फल पाया
॥ सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी ॥
॥ इति श्री विन्ध्येश्वरी आरती ॥
आरती अतिपावन पुराण की ।
धर्म-भक्ति-विज्ञान-खान की ॥
महापुराण भागवत निर्मल ।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल ॥
परमानन्द सुधा-रसमय कल ।
लीला-रति-रस रसनिधान की ॥
॥ आरती अतिपावन पुरान की ॥
कलिमथ-मथनि त्रिताप-निवारिणि ।
जन्म-मृत्यु भव-भयहारिणी ॥
सेवत सतत सकल सुखकारिणि ।
सुमहौषधि हरि-चरित गान की ॥
॥ आरती अतिपावन पुरान की ॥
विषय-विलास-विमोह विनाशिनि ।
विमल-विराग-विवेक विकासिनि ॥
भगवत्-तत्त्व-रहस्य-प्रकाशिनि ।
परम ज्योति परमात्मज्ञान की ॥
॥ आरती अतिपावन पुरान की ॥
परमहंस-मुनि-मन उल्लासिनि ।
रसिक-हृदय-रस-रासविलासिनि ॥
भुक्ति-मुक्ति-रति-प्रेम सुदासिनि ।
कथा अकिंचन प्रिय सुजान की ॥
॥ आरती अतिपावन पुरान की ॥
॥ इति श्रीमद्भागवतमहापुराण की आरती ॥
आरती श्री गैय्या मैंय्या की,
आरती हरनि विश्वब धैय्या की,
अर्थकाम सुद्धर्म प्रदायिनि
अविचल अमल मुक्तिपददायिनि,
सुर मानव सौभाग्यविधायिनि,
प्यारी पूज्य नंद छैय्या,
अख़िल विश्वौ प्रतिपालिनी माता,
मधुर अमिय दुग्धान्न प्रदाता,
रोग शोक संकट परित्राता
भवसागर हित दृढ़ नैय्या की,
आयु ओज आरोग्यविकाशिनि,
दुख दैन्य दारिद्रय विनाशिनि,
सुष्मा सौख्य समृद्धि प्रकाशिनि,
विमल विवेक बुद्धि दैय्या की,
सेवक जो चाहे दुखदाई,
सम पय सुधा पियावति माई,
शत्रु मित्र सबको सुखदायी,
स्नेह स्वभाव विश्व जैय्या की,
॥ इति आरती श्री गौमता जी की ॥
श्री नर्मदा जी की आरती
ॐ जय जगदानन्दी,
मैया जय आनन्द कन्दी ।
ब्रह्मा हरिहर शंकर रेवा शिव ,
हरि शंकर रुद्री पालन्ती॥
॥ ॐ जय जय जगदानन्दी ॥
देवी नारद शारद तुम वरदायक,
अभिनव पदचण्डी।
सुर नर मुनि जन सेवत,
सुर नर मुनि शारद पदवन्ती॥
॥ ॐ जय जय जगदानन्दी ॥
देवी धूमक वाहन,
राजत वीणा वादयन्ती।
झूमकत झूमकत झूमकत
झननना झननना रमती राजन्ती॥
॥ ॐ जय जय जगदानन्दी ॥
देवी बाजत ताल मृदंगा
सुरमण्डल रमती।
तोड़ीतान तोड़ीतान तोड़ीतान
तुरड़ड़ तुरड़ड़ तुरड़ड़ रमती सुरवन्ती॥
॥ ॐ जय जय जगदानन्दी ॥
देवी सकल भुवन पर आप विराजत,
निशदिन आनन्दी।
गावत गंगा शंकर,सेवत रेवा शंकर ,
तुम भव मेटन्ती॥
॥ ॐ जय जय जगदानन्दी ॥
मैया जी को कंचन थाल विराजत,
अगर कपूर बाती।
अमर कंठ विराजत,
घाटन घाट कोटी रतन जोती॥
॥ ॐ जय जय जगदानन्दी ॥
मैया जी की आरती निशदिन
पढ़ि पढ़ि जो गावें।
भजत शिवानन्द स्वामी
मन वांछित फल पावें॥
॥ ॐ जय जय जगदानन्दी ॥
॥ इति श्री नर्मदा आरती ॥
जय पार्वती माता
जय पार्वती माता
ब्रह्म सनातन देवी
शुभफल की दाता ।
॥ जय पार्वती माता ॥
अरिकुल पद्दं विनासनी
जय सेवक त्राता,
जगजीवन जगदंबा
हरिहर गुणगाता ।
॥ जय पार्वती माता ॥
सिंह को वाहन साजे
कुण्डल है साथा,
देब बंधु जस गावत
नृत्य करत ता था ।
॥ जय पार्वती माता ॥
सतयुग रूपशील अति सुन्दर
नाम सती कहलाता,
हेमांचल घर जन्मी
सखियन संग राता ।
॥ जय पार्वती माता ॥
शुम्भ निशुम्भ विदारे
हेमाचल स्थाता,
सहस्त्र भुज तनु धारिके
चक्र लियो हाथा ।
॥ जय पार्वती माता ॥
सृष्टिरूप तुही है जननी
शिवसंग रंगराता,
नन्दी भृंगी बीन लही है
हाथन मदमाता ।
॥ जय पार्वती माता ॥
देवन अरज करत
तव चित को लाता,
गावत दे दे ताली
मन में रंग राता ।
॥ जय पार्वती माता ॥
श्री कमल आरती मैया की
जो कोई गाता ,
सदा सुखी नित रहता
सुख सम्पति पाता ।
॥ जय पार्वती माता ॥
॥ इति श्री पार्वती आरती ॥
आरती देवी अन्नपूर्णा जी की
बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम।
जो नहीं ध्यावै तुम्हें अम्बिके, कहां उसे विश्राम।
अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारो, लेत होत सब काम॥
॥ बारम्बार प्रणाम ॥
प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर, कालान्तर तक नाम।
सुर सुरों की रचना करती, कहाँ कृष्ण कहाँ राम॥
॥ बारम्बार प्रणाम ॥
चूमहि चरण चतुर चतुरानन, चारु चक्रधर श्याम।
चंद्रचूड़ चन्द्रानन चाकर, शोभा लखहि ललाम॥
॥ बारम्बार प्रणाम ॥
देवी देव! दयनीय दशा में दया-दया तब नाम।
त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल शरण रूप तब धाम॥
॥ बारम्बार प्रणाम ॥
श्रीं, ह्रीं श्रद्धा श्री ऐ विद्या श्री क्लीं कमला काम।
कांति, भ्रांतिमयी, कांति शांतिमयी, वर दे तू निष्काम॥
॥ बारम्बार प्रणाम ॥
॥ इति श्री माँ अन्नपूर्णा आरती ॥
मंगल की सेवा सुन मेरी देवा ,
हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े।
पान सुपारी ध्वजा नारियल
ले ज्वाला तेरी भेंट करें।
सुन जगदम्बे कर न विलम्बे,
संतन के भडांर भरे।
सन्तान प्रतिपाली सदा खुशहाली,
जै काली कल्याण करे ।
बुद्धि विधाता तू जग माता ,
मेरा कारज सिद्ध करे।
चरण कमल का लिया आसरा,
शरण तुम्हारी आन पड़े।
जब जब भीर पड़ी भक्तन पर,
तब तब आय सहाय करे।
बार बार तै सब जग मोहयो,
तरूणी रूप अनूप धरे।
माता होकर पुत्र खिलावे,
कही भार्या भोग करे॥
संतन सुखदायी,सदा सहाई ,
संत खड़े जयकार करे ।
ब्रह्मा ,विष्णु,महेश फल लिए
भेंट देन सब द्वार खड़े|
अटल सिहांसन बैठी माता,
सिर सोने का छत्र धरे ॥
वार शनिचर कुंकुमवरणी,
जब लुकुण्ड पर हुक्म करे ।
खड्ग खप्पर त्रिशुल हाथ लिये,
रक्त बीज को भस्म करे।
शुम्भ निशुम्भ क्षणहि में मारे ,
महिषासुर को पकड़ धरे ॥
आदित वारी आदि भवानी ,
जन अपने को कष्ट हरे ।
कुपित होकर दानव मारे,
चण्ड मुण्ड सब चूर करे ॥
जब तुम देखी दया रूप हो,
पल मे सकंट दूर टरे।
सौम्य स्वभाव धरयो मेरी माता ,
जन की अर्ज कबूल करे ॥
सात बार की महिमा बरनी,
सब गुण कौन बखान करे।
सिंह पीठ पर चढी भवानी,
अटल भवन मे राज्य करे ॥
दर्शन पावे मंगल गावे ,
सिद्ध साधक तेरी भेट धरे ।
ब्रह्मा वेद पढे तेरे द्वारे,
शिव शंकर हरी ध्यान धरे ॥
इन्द्र कृष्ण तेरी करे आरती,
चॅवर कुबेर डुलाय रहे।
जय जननी जय मातु भवानी ,
अटल भवन मे राज्य करे ॥
सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली,
मैया जै काली कल्याण करे।
॥ इति श्री महाकाली आरती ॥
जय शीतला माता,
मैया जय शीतला माता,
आदि ज्योति महारानी
सब फल की दाता।
॥ जय शीतला माता ॥
रतन सिंहासन शोभित,
श्वेत छत्र भ्राता,
ऋद्धि-सिद्धि मिल चंवर डोलावें,
जगमग छवि छाता।
॥ जय शीतला माता ॥
विष्णु सेवत ठाढ़े,
सेवें शिव धाता,
वेद पुराण वरणत ,
पार नहीं पाता ।
॥ जय शीतला माता ॥
इन्द्र मृदंग बजावत,
चन्द्र वीणा हाथा,
सूरज ताल बजावै
नारद मुनि गाता।
॥ जय शीतला माता ॥
घंटा शंख शहनाई
बाजै मन भाता,
करै भक्त जन आरती
लखि लखि हर्षाता।
॥ जय शीतला माता ॥
ब्रह्म रूप वरदानी तुही
तीन काल ज्ञाता,
भक्तन को सुख देनौ
मातु पिता भ्राता।
॥ जय शीतला माता ॥
जो जन ध्यान लगावें
प्रेम शक्ति पाता,
सकल मनोरथ पावे
भवनिधि तर जाता।
॥ जय शीतला माता ॥
रोगों से जो पीड़ित कोई
शरण तेरी आता,
कोढ़ी पावे निर्मल काया
अन्ध नेत्र पाता।
॥ जय शीतला माता ॥
बांझ पुत्र को पावे
दारिद कट जाता,
ताको भजै जो नाहीं
सिर धुनि पछिताता।
॥ जय शीतला माता ॥
शीतल करती जन को
तू ही है जग त्राता,
उत्पत्ति व्याधि विनाशन
तू सब की माता।
॥ जय शीतला माता ॥
दास नारायण कर जोड़े
सुन मेरी माता,
भक्ति आपनी दीजे
और न कुछ भाता।
॥ जय शीतला माता ॥
॥ इति श्री शीतला आरती ॥
पितु मातु सहायक स्वामी सखा ,
तुम ही एक नाथ हमारे हो।
जिनके कुछ और आधार नहीं ,
तिनके तुम ही रखवारे हो ।
सब भॉति सदा सुखदायक हो ,
दुख निर्गुण नाशन हरे हो ।
प्रतिपाल करे सारे जग को,
अतिशय करुणा उर धारे हो ।
भूल गये हैं हम तो तुमको ,
तुम तो हमरी सुधि नहिं बिसारे हो ।
उपकारन को कछु अंत नहीं,
छिन्न ही छिन्न जो विस्तारे हो ।
महाराज महा महिमा तुम्हारी,
मुझसे विरले बुधवारे हो ।
शुभ शांति निकेतन प्रेम निधि ,
मन मंदिर के उजियारे हो ।
इस जीवन के तुम ही जीवन हो ,
इन प्राणण के तुम प्यारे हो में ।
तुम सों प्रभु पये “कमल” हरि,
केहि के अब और सहारे हो ।
॥ इति श्री ब्रह्मा आरती ॥
ओम जय श्री कृष्ण हरे,
प्रभु जय श्री कृष्ण हरे,
भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे
!! ओम जय श्री कृष्ण हरे !!
परमानंद मुरारी मोहन गिरधारी,
जय रास बिहारी जय जय गिरधारी
!! ओम जय श्री कृष्ण हरे !!
कर कंकण कटि सोहत कानन मे बाला,
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे वनमाला
!! ओम जय श्री कृष्ण हरे !!
दीन सुदामा तारे दरिद्रों के दुख टारे ,
गज के फंद छुड़ये भव सागर तारे
!! ओम जय श्री कृष्ण हरे !!
हिरण्यकश्यप संहारे नरहरि रूप धरे ,
पाहन से प्रभु प्रगटे यम के बीच परे
!! ओम जय श्री कृष्ण हरे !!
केशी कंस विदारे नल कुबर तारे,
दामोदर छवि सुंदर भगतन के प्यारे
!! ओम जय श्री कृष्ण हरे !!
काली नाग नथैया नटवर छवि सोहे,
फन फन नाचा करते नागन मन मोहे
!! ओम जय श्री कृष्ण हरे !!
राज्य उग्रसेन पाये माताशोक हरे,
द्रुपद सुता पत राखी,
करुणा लाज भरे
!! ओम जय श्री कृष्ण हरे !!
॥ इति श्री कृष्णा आरती ॥
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली |
माँ काली आरती तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||
तेरे भक्त जनों पे माता, भीर पड़ी है भारी |
दानव दल पर टूट पडो माँ, करके सिंह सवारी ||
सौ सौ सिंहों से तु बलशाली, दस भुजाओं वाली |
दुखिंयों के दुखडें निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||
माँ बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता |
पूत कपूत सूने हैं पर, माता ना सुनी कुमाता ||
सब पर करुणा दरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली |
दुखियों के दुखडे निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||
नहीं मांगते धन और दौलत, न चाँदी न सोना |
हम तो मांगे माँ तेरे मन में, इक छोटा सा कोना ||
सबकी बिगडी बनाने वाली, लाज बचाने वाली |
सतियों के सत को संवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली |
तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||
गले में बैजंती माला,
बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला,
नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली,
राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
॥ आरती कुंजबिहारी की…॥
कनकमय मोर मुकुट बिलसै,
देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै ।
बजे मुरचंग,
मधुर मिरदंग,
ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
॥ आरती कुंजबिहारी की…॥
जहां ते प्रकट भई गंगा,
सकल मन हारिणि श्री गंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा
बसी शिव सीस,
जटा के बीच,
हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
॥ आरती कुंजबिहारी की…॥
चमकती उज्ज्वल तट रेनू,
बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू
हंसत मृदु मंद,
चांदनी चंद,
कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
॥ आरती कुंजबिहारी की…॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
हर हर गंगे, जय माँ गंगे ॥
ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता ।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता ॥
चंद्र सी जोत तुम्हारी जल निर्मल आता ।
शरण पडें जो तेरी सो नर तर जाता ॥
॥ ॐ जय गंगे माता…॥
पुत्र सगर के तारे सब जग को ज्ञाता ।
कृपा दृष्टि तुम्हारी त्रिभुवन सुख दाता॥
॥ ॐ जय गंगे माता…॥
एक ही बार जो तेरी शारणागति आता ।
यम की त्रास मिटा कर परमगति पाता॥
॥ ॐ जय गंगे माता…॥
आरती मात तुम्हारी जो जन नित्य गाता ।
दास वही सहज में मुक्त्ति को पाता॥
॥ ॐ जय गंगे माता…॥
ॐ जय गंगे माता श्री जय गंगे माता ।
जो नर तुमको ध्याता मनवांछित फल पाता॥
ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता ।
सत्यानारयाना स्वामी जन पटक हरना
रत्ना जडित सिंघासन अद्भुत छबि राजे
नारद करत निरंजन घंटा ध्वनि बाजे
प्रकट भये कलि कारन द्विज को दरस दियो
बुधो ब्रह्मिन बनकर कंचन महल कियो
दुर्बल भील कराल जिनपर किरपा करी
चंद्रचूड एक राजा तिनकी विपति हरी
भाव भक्ति के कारन छिन छिन रूप धरयो
श्रद्धा धारण किन्ही तिनके काज सरयो
ग्वाल बाल संग राजा बन में भक्ति करी
मन वांछित फल दीन्हा दीनदयाल हरी
चढात प्रसाद सवायो कदली फल मेवा
धुप दीप तुलसी से राजी सतदेवा
श्री सत्यानारयाना जी की आरती जो कोई नर गावे
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी जय लक्ष्मीरमणा |
सत्यनारायण स्वामी ,जन पातक हरणा || जय लक्ष्मीरमणा
रत्नजडित सिंहासन , अद्भुत छवि राजें |
नारद करत निरतंर घंटा ध्वनी बाजें ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी….
प्रकट भयें कलिकारण ,द्विज को दरस दियो |
बूढों ब्राम्हण बनके ,कंचन महल कियों ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..
दुर्बल भील कठार, जिन पर कृपा करी |
च्रंदचूड एक राजा तिनकी विपत्ति हरी ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..
वैश्य मनोरथ पायों ,श्रद्धा तज दिन्ही |
सो फल भोग्यों प्रभूजी , फेर स्तुति किन्ही ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..
भाव भक्ति के कारन .छिन छिन रुप धरें |
श्रद्धा धारण किन्ही ,तिनके काज सरें ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..
ग्वाल बाल संग राजा ,वन में भक्ति करि |
मनवांचित फल दिन्हो ,दीन दयालु हरि ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..
चढत प्रसाद सवायों ,दली फल मेवा |
धूप दीप तुलसी से राजी सत्य देवा ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..
सत्यनारायणजी की आरती जो कोई नर गावे |
ऋद्धि सिद्धी सुख संपत्ति सहज रुप पावे ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी जय लक्ष्मीरमणा|
सत्यनारायण स्वामी ,जन पातक हरणा ॥ जय लक्ष्मीरमणा
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