Showing posts with label ग्रह नवग्रह देव. Show all posts
Showing posts with label ग्रह नवग्रह देव. Show all posts

Saturday, February 13, 2021

नवग्रह स्तोत्र ||

 
जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महदद्युतिम् |

तमोरिंसर्वपापघ्नं प्रणतोSस्मि दिवाकरम् || १ ||


दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम् |

नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम् || २ ||


धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कांति समप्रभम् |

कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणाम्यहम् || ३ ||


प्रियंगुकलिकाश्यामं रुपेणाप्रतिमं बुधम् |

सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् || ४ ||


देवानांच ऋषीनांच गुरुं कांचन सन्निभम् |

बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् || ५ ||


हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् |

सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् || ६ ||


नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् |

छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् || ७ ||


अर्धकायं महावीर्यं चंद्रादित्य विमर्दनम् |

सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् || ८ ||


पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम् |

रौद्रंरौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् || ९ ||


इति श्रीव्यासमुखोग्दीतम् यः पठेत् सुसमाहितः |

दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्न शांतिर्भविष्यति || १० ||


नरनारी नृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम् |

ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् || ११ ||


ग्रहनक्षत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुभ्दवाः |

ता सर्वाःप्रशमं यान्ति व्यासोब्रुते न संशयः || १२ ||

श्री नवग्रह आरती


आरती श्री नवग्रहों की कीजै,
कष्ट,रोग,हर लीजै ।


सूर्य तेज़ व्यापे जीवन भर
जाकी कृपा कबहु नहिं छीजै।


॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥


रुप चंद्र शीतलता लायें
शांति स्नेह सरस रसु भीजै।


॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥


मंगल हरे अमंगल सारा
सौम्य सुधा रस अमृत पीजै ।


॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥


बुद्ध सदा वैभव यश लीये.
सुख सम्पति लक्ष्मी पसीजै।


॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥


विद्या बुद्धि ज्ञान गुरु से ले लो
प्रगति सदा मानव पै रीझे।


॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥


शुक्र तर्क विज्ञान बढावै
देश धर्म सेवा यश लीजे ।


॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥


न्यायधीश शनि अति ज्यारे
जप तप श्रद्धा शनि को दीजै ।


॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥


राहु मन का भरम हरावे
साथ न कबहु कुकर्म न दीजै ।


॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥


स्वास्थ्य उत्तम केतु राखै
पराधीनता मनहित खीजै ।


॥ आरती श्री नवग्रहों की कीजै ॥


॥ इति श्री नवग्रह आरती ॥

श्री नवग्रह चालीसा


॥ दोहा॥


श्री गणपति ग़ुरुपद कमल,
प्रेम सहित सिरनाय ,
नवग्रह चालीसा कहत,
शारद होत सहाय जय,
जय रवि शशि सोम बुध,
जय गुरु भृगु शनि राज,
जयति राहू अरु केतु ग्रह,
करहु अनुग्रह आज !!


॥ चौपाई ॥


श्री सूर्य स्तुति
प्रथमही रवि कहं नावों माथा,
करहु कृपा जन जानि अनाथा,
हे आदित्य दिवाकर भानु,
मै मति मन्द महा अज्ञानु,
अब निज जन कहं हरहु क्लेशा,
दिनकर द्वादश रूप दिनेशा,
नमो भास्कर सूर्य प्रभाकर,
अर्क मित्र अघ मोघ क्षमाकर !!


श्री चंद्र स्तुति
शशि मयंक रजनी पति स्वामी,
चंद्र कलानिधि नमो नमामि,
राकापति हिमांशु राकेशा,
प्रणवत जन तन हरहु कलेशा,
सोम इंदु विधु शान्ति सुधाकर,
शीत रश्मि औषधि निशाकर ,
तुम्ही शोभित सुंदर भाल महेशा,
शरण शरण जन हरहु कलेशा !!


श्री मंगल स्तुति
जय जय मंगल सुखा दाता,
लोहित भौमादिक विख्याता ,
अंगारक कुंज रुज ऋणहारि,
करहु दया यही विनय हमारी ,
हे महिसुत छितिसुत सुखराशी,
लोहितांगा जय जन अघनाशी ,
अगम अमंगल अब हर लीजै,
सकल मनोरथ पूरण कीजै !!


श्री बुध स्तुति
जय शशि नंदन बुध महाराजा,
करहु सकल जन कहॅ शुभ काजा,
दीजै बुद्धिबल सुमति सुजाना,
कठिन कष्ट हरी करी कल्याणा ,
हे तारासुत रोहिणी नंदन,
चंद्र सुवन दु:ख द्वंद निकन्दन,
पूजहु आस दास कहूँ स्वामी ,
प्रणत पाल प्रभु नमो नमामि !!


श्री बृहस्पति स्तुति
जयति जयति जय श्री गुरु देवा,
करहु सदा तुम्हरी प्रभु सेवा,
देवाचार्य तुम देव गुरु ज्ञानी,
इन्द्र पुरोहित विद्या दानी,
वाचस्पति बागीश उदारा,
जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा,
विद्या सिन्धु अंगीरा नामा,
करहु सकल विधि पूरण कामा !






श्री शुक्र स्तुति
शुक्र देव पद तल जल जाता,
दास निरंतर ध्यान लगाता,
हे उशना भार्गव भृगु नंदन ,
दैत्य पुरोहित दुष्ट निकन्दन,
भृगुकुल भूषण दूषण हारी,
हरहु नैष्ट ग्रह करहु सुखारी,
तुही द्विजवर जोशी सिरताजा,
नर शरीर के तुम्हीं राजा !!


श्री शनि स्तुति
जय श्री शनि देव रवि नंदन ,
जय कृष्णो सौरी जगवन्दन,
पिंगल मन्द रौद्र यम नामा,
वप्र आदि कोणस्थ ललामा,
वक्र दृष्टी पिप्पल तन साजा,
क्षण महॅ करत रंक क्षण राजा ,
ललत स्वर्ण पद करत निहाला,
हरहु विपत्ति छाया के लाला !


श्री राहू स्तुति
जय जय राहू गगन प्रविसइया,
तुम्ही चंद्र आदित्य ग्रसईया,
रवि शशि अरि सर्वभानु धारा,
शिखी आदि बहु नाम तुम्हारा,
सैहिंकेय तुम निशाचर राजा,
अर्धकार्य जग राखहु लाजा,
यदि ग्रह समय पाय कहिं आवहु,
सदा शान्ति और सुखा उपजवाहू !!


श्री केतु स्तुति
जय श्री केतु कठिन दुखहारी,
करहु सृजन हित मंगलकारी,
ध्वजयुक्त रुण्द रूप विकराला,
घोर रौद्रतन अधमन काला ,
शिखी तारिका ग्रह बलवाना,
महा प्रताप न तेज ठिकाना,
वाहन मीन महा शुभकारी,
दीजै शान्ति दया उर धारी !!


नवग्रह शान्ति फल
तीरथराज प्रयाग सुपासा,
बसै राम के सुंदर दासा,
ककरा ग्राम्हीं पुरे-तिवारी,
दुर्वासाश्रम जन दुख हारी,
नव-ग्रह शान्ति लिख्यो सुख हेतु,
जन तन कष्ट उतारण सेतु,
जो नित पाठ करै चित लावे,
सब सुख भोगी परम पद पावे !!


॥ दोहा ॥


धन्य नवग्रह देव प्रभु,
महिमा अगम अपार,
चित्त नव मंगल मोद गृह,
जगत जनन सुखद्वारा ,
यह चालीसा नावोग्रह
विरचित सुन्दरदास,
पढ़त प्रेमयुक्त बढ़त सुख,
सर्वानन्द हुलास !!


॥ इति श्री नवग्रह चालीसा ॥