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Wednesday, March 17, 2021

 श्री तुलसी स्तोत्रम्‌ ||


जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं विष्णोश्च प्रियवल्लभे ।
यतो ब्रह्मादयो देवाः सृष्टिस्थित्यन्तकारिणः ॥१॥

नमस्तुलसि कल्याणि नमो विष्णुप्रिये शुभे ।
नमो मोक्षप्रदे देवि नमः सम्पत्प्रदायिके ॥२॥

तुलसी पातु मां नित्यं सर्वापद्भ्योऽपि सर्वदा ।
कीर्तितापि स्मृता वापि पवित्रयति मानवम् ॥३॥

नमामि शिरसा देवीं तुलसीं विलसत्तनुम् ।
यां दृष्ट्वा पापिनो मर्त्या मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषात् ॥४॥

तुलस्या रक्षितं सर्वं जगदेतच्चराचरम् ।
या विनिहन्ति पापानि दृष्ट्वा वा पापिभिर्नरैः ॥५॥

नमस्तुलस्यतितरां यस्यै बद्ध्वाञ्जलिं कलौ ।
कलयन्ति सुखं सर्वं स्त्रियो वैश्यास्तथाऽपरे ॥६॥

तुलस्या नापरं किञ्चिद् दैवतं जगतीतले ।
यथा पवित्रितो लोको विष्णुसङ्गेन वैष्णवः ॥७॥

तुलस्याः पल्लवं विष्णोः शिरस्यारोपितं कलौ ।
आरोपयति सर्वाणि श्रेयांसि वरमस्तके ॥८॥

तुलस्यां सकला देवा वसन्ति सततं यतः ।
अतस्तामर्चयेल्लोके सर्वान् देवान् समर्चयन् ॥९॥

नमस्तुलसि सर्वज्ञे पुरुषोत्तमवल्लभे ।
पाहि मां सर्वपापेभ्यः सर्वसम्पत्प्रदायिके ॥१०॥

इति स्तोत्रं पुरा गीतं पुण्डरीकेण धीमता ।
विष्णुमर्चयता नित्यं शोभनैस्तुलसीदलैः ॥११॥

तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी ।
धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमनःप्रिया ॥१२॥

लक्ष्मीप्रियसखी देवी द्यौर्भूमिरचला चला ।
षोडशैतानि नामानि तुलस्याः कीर्तयन्नरः ॥१३॥

लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत् ।
तुलसी भूर्महालक्ष्मीः पद्मिनी श्रीर्हरिप्रिया ॥१४॥

तुलसि श्रीसखि शुभे पापहारिणि पुण्यदे ।
नमस्ते नारदनुते नारायणमनःप्रिये ॥१५॥

 श्री तुलसी स्तोत्र || 


पापानि यानि रविसूनुपटस्थितानि गोब्रह्मबालपितृमातृवधादिकानि।

नश्यन्ति तानि तुलसीवनदर्शनेन गोकोटिदानसदृशं फलमाशु च स्यात् ॥१॥


या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुः पावनी रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्ताऽन्तकत्रासिनी।

प्रत्यासक्तिविधायिनी भगवतः कृष्णस्य संरोपिता न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नमः ॥२॥


ललाटे यस्य दृश्येत तुलसीमूलमृत्तिका यमस्तं ।

नेक्षितुं शक्तः किमु दूता भयङ्कराः ॥३॥


तुलसीकाननं यत्र यत्र पद्मवनानि च।

वसन्ति वैष्णवा यत्र तत्र सन्निहितो हरिः॥४॥


पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा।

वासुदेवादयो देवाः वसन्ति तुलसीवने ॥५॥


तुलसि श्रीसखि शुभे पापहारिणि पुण्यदे।

नमस्ते नारदनुते नारायणमनःप्रिये ॥६॥


Thursday, February 18, 2021

घर में है तुलसी तो रखें यह ध्यान


यह तो हम सभी जानते हैं कि घर में तुलसी का होना कितनी अनिवार्य परंपरा मानी जाती है, इसलिए काफी लोग घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाते हैं। अगर आपके घर में भी तुलसी है तो शिवपुराण और पुरानी परंपराओं के अनुसार बताई गई तुलसी से जुड़ी कुछ अहम बातों का ज़रूर ध्यान रखें। तुलसी न केवल धार्मिक महत्‍व रखती है, बल्कि इसके कई स्‍वास्‍थ्‍य लाभ भी हैं। कई वैज्ञानिक शोध तुलसी में उपस्थित गुणों की पुष्टि करते हैं। भारत में पुरातन काल से ही तुलसी के औषधीय गुणों को काफी महत्ता दी जाती है। आइए जानें ऐसे ही कुछ गुणों के बारे में जो हमारे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए लाभप्रद है। प्राचीन काल से ही यह परंपरा चली आ रही है कि घर में तुलसी का पौधा होना चाहिए। शास्त्रों में तुलसी को पूजनीय, पवित्र और देवी स्वरूप माना गया है.



इस अनमोल पौधे के कुल 5 प्रकार होतेे हैं, जो स्वास्थ्य से लेकर वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जानिए तुलसी के यह 5 प्रकार -


1) श्याम तुलसी,
2) राम तुलसी,
3) श्वेत/विष्णु तुलसी,
4) वन तुलसी,
5) नींबू तुलसी



तुलसी के पांचों प्रकारों को मिलाकर इनका अर्क निकाला जाए, तो यह पूरे विश्व की सबसे प्रभावकारी और बेहतरीन दवा न सकती है। एक एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी- बैक्टीरियल, एंटी-वायरल, एंटी-फ्लू, एंटी-बायोटिक, एंटी-इफ्लेमेन्ट्री व एंटी – डिजीज की तह कार्य करने लगती है।


1. शिवपुराण की मानें तो तुलसी दैत्यों के राजा शंखचूड़ की पत्नी थी। वह शिव जी थे जिन्होंने शंखचूड़ का वध किया था। शंखचूड़ की पत्नी होने के कारण शिवलिंग पर कभी तुलसी का पौधा नहीं चढ़ाना चाहिए। अगर आप गलती से भी शिवलिंग पर तुलसी के पत्ते चढ़ा देते हैं तो भगवान शिव नाराज़ हो जाते हैं।


2. जान लें कि आयुर्वेद में भी यह बात कही गई है कि तुलसी का सेवन आपके स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद होता है। ध्यान इस बात का रखें कि आप तुलसी को कभी चबाए नहीं बल्कि निगल जाया करें क्योंकि तुलसी में पारा धातु पाई जाती है जो कि हमारे दांतों को नुकसान पहुंचाती है। तुलसी की पत्तियां कफ साफ करने में मदद करती हैं। तुलसी की कोमल पत्तियों को अदरक के साथ चबाने से खांसी-जुकाम से राहत मिलती है। तुलसी को चाय की पत्तियों के साथ उबालकर पीने से गले की खराश दूर हो जाती है।

श्वास संबंधी समस्याओं का उपचार करने में तुलसी खासी उपयोगी साबित होती है। शहद, अदरक और तुलसी को मिलाकर बनाया गया काढ़ा पीने से ब्रोंकाइटिस, दमा, कफ और सर्दी में राहत मिलती है।

तुलसी की कुछ पत्तियों को रोजाना चबाने से मुंह का संक्रमण दूर हो जाता है। तुलसी की सूखी पत्तियों को सरसों के तेल के साथ मिलाकर दांतों को साफ करने से सांसों से दुर्गध नहीं आती है।

तुलसी किडनी को मजबूत बनाती है। किडनी की पथरी में तुलसी की पत्तियों को उबालकर उसका अर्क बना लें। इस अर्क को शहद के साथ नियमित 6 महीने तक सेवन करने से पथरी यूरीन मार्ग से बाहर निकल जाती है।


3. जान लें कि तुलसी के पत्ते कभी भी एकादशी, रविवार, सूर्य या चंद्र ग्रहण में और रात के समय नहीं तोड़ना चाहिए। ध्यान रखें कि बिना किसी वजह के तुलसी का पौधा तोड़ना पाप माना गया है।


4. मान्यता यह भी है कि जिस घर के लोग शाम के समय तुलसी के पास दीपक जलाते हैं और तुलसी की पूजा करते हैं उनके घर पर मां लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है।


5. वहीं वास्तु के अनुसार घर में तुलसी का पौधा लगाने से हर प्रकार के वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं। यही नहीं, परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी इसका शुभ असर होता है।


6. कहते हैं अगर तुलसी का पौधा घर में हो तो घर पर किसी की बुरी नज़र नहीं लगती है। साथ ही, घर के आसपास किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा नहीं पनप पाती है और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती ही चली जाती है।


7. आयुर्वेद की मानें तो तुलसी किसी संजीवनी बुटी से कम नहीं है। तुलसी की महक से आपकी सांस से संबंधित कई रोग ठीक हो सकते हैं। यही नहीं, तुलसी का एक पत्ता रोजाना खाने करने से आप सामान्य बुखार से हमेशा बचें रहेंगे। तुलसी में थाइमोल तत्व पाया जाता है, जो त्‍वचा रोगों को दूर करने में मददगार होता है। तुलसी और नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाकर चेहरे पर लगाने से झाइयां व फुंसियां ठीक होती हैं। और साथ ही चेहरे की रंगत में निखार आता है।
श्री तुलसी अष्टोत्तर शतनामावली || 


ॐ तुलस्यै नमः
ॐ पावन्यै नमः
ॐ पूज्यायै नमः
ॐ वृन्दावननिवासिन्यै नमः


ॐ ज्ञानदात्र्यै नमः
ॐ ज्ञानमय्य नमः
ॐ निर्मलायै नमः
ॐ सर्वपूजितायै नमः
ॐ सत्यै नमः
ॐ पतिव्रतायै नमः


ॐ वृन्दायै नमः
ॐ क्षीराब्धिमथनोद्भवायै नमः
ॐ कृष्णवर्णाय नमः
ॐ रोगहन्त्र्यै नमः
ॐ त्रिवर्णायै नमः
ॐ सर्वकामदाय नमः


ॐ लक्ष्मीसख्यै नमः
ॐ नित्यशुद्धाय नमः
ॐ सुदत्यै नमः
ॐ भूमिपावन्यै नमः
ॐ हरिध्यानैकनिरताय नमः
ॐ हरिपादकृतालयायै नमः


ॐ पवित्ररूपिण्य नमः
ॐ धन्यायै नमः
ॐ सुगन्धिन्यै नमः
ॐ अमृतोद्भवायै नमः


ॐ सुरूपारोग्यदायै नमः
ॐ तुष्टायै नमः
ॐ शक्तित्रितयरूपिण्यै नमः
ॐ देव्यै नमः


ॐ देवर्षिसंस्तुत्यायै नमः
ॐ कान्तायै नमः
ॐ विष्णुमनःप्रियायै नमः
ॐ भूतवेतालभीतिघ्न्यै नमः
ॐ महापातकनाशिन्यै नमः
ॐ मनोरथप्रदायै नमः


ॐ मेधायै नमः
ॐ कान्त्यै नमः
ॐ विजयदायिन्यै नमः
ॐ शंखचक्रगदा पद्मधारिण्यै नमः
ॐ कामरूपिण्यै नमः
ॐ अपवर्गप्रदायै नमः
ॐ श्यामायै नमः


ॐ कृशमध्यायै नमः
ॐ सुकेशिन्यै नमः
ॐ वैकुण्ठवासिन्यै नमः
ॐ नन्दायै नमः
ॐ बिंबोष्ठ्यै नमः
ॐ कोकिलस्वनायै नमः


ॐ कपिलायै नमः
ॐ निम्नगाजन्मभूम्य नमः
ॐ आयुष्यदायिन्यै नमः


ॐ वनरूपायै नमः
ॐ दुःखनाशिन्यै नमः
ॐ अविकारायै नमः
ॐ चतुर्भुजायै नमः
ॐ गरुत्मद्वाहनायै नमः


ॐ शान्तायै नमः
ॐ दान्तायै नमः
ॐ विघ्ननिवारिण्यै नमः
ॐ विष्णुमूलिकायै नमः
ॐ पुष्टायै नमः
ॐ त्रिवर्गफलदायिन्यै नमः
ॐ महाशक्त्यै नमः
ॐ र्महामायायै नमः


ॐ लक्ष्मीवाणीसुपूजितायै नमः
ॐ सुमंगल्यर्चनप्रीतायै नमः
ॐ सौमङ्गल्यविवर्धिन्यै नमः
ॐ चातुर्मासोत्सवाराध्यायै नमः


ॐ विष्णुसान्निध्यदायिन्यै नमः
ॐ उत्तानद्वादशीपूज्यायै नमः
ॐ सर्वदेवप्रपूजिताय नमः
ॐ गोपीरतिप्रदायै नमः
ॐ नित्यायै नमः
ॐ निर्गुणायै नमः
ॐ पार्वतीप्रियायै नमः
ॐ अपमृत्युहरायै नमः


ॐ राधाप्रियायै नमः


ॐ मृगविलोचनायै नमः
ॐ अम्लानायै नमः
ॐ हंसगमनायै नमः
ॐ कमलासनवन्दितायै नमः
ॐ भूलोकवासिन्यै नमः
ॐ शुद्धायै नमः


ॐ रामकृष्णादिपूजितायै नमः
ॐ सीतापूज्यायै नमः
ॐ राममनःप्रियायै नमः
ॐ नन्दनसंस्थितायै नमः
ॐ सर्वतीर्थमय्यै नमः


ॐ मुक्तायै नमः
ॐ लोकसृष्टिविधायिन्यै नमः
ॐ प्रातर्दृश्यायै नमः
ॐ ग्लानिहन्त्र्यै नमः
ॐ वैष्णव्यै नमः
ॐ सर्वसिद्धिदायै नमः


ॐ नारायण्यै नमः
ॐ सन्ततिदायै नमः
ॐ मूलमृद्धारिपावन्य नमः
ॐ अशोकवनिकासंस्थायै नमः
ॐ सीताध्यातायै नमः


ॐ निराश्रयायै नमः
ॐ गोमतीसरयूतीररोपितायै नमः
ॐ कुटिलालकायै नमः
ॐ अपात्रभक्ष्यपापघ्न्यै नमः


ॐ दानतोयविशुद्धिदायै नमः
ॐ श्रुतिधारणसुप्रीतायै नमः
ॐ शुभायै नमः
ॐ सर्वेष्टदायिन्यै नमः

श्री तुलसी शतनाम स्तोत्रम


तुलसी पावनी पूज्या वृन्दावननिवासिनी !
ज्ञानदात्री ज्ञानमयी निर्मला सर्वपूजिता ॥1॥

सती पतिव्रता वृन्दा क्षीराब्धिमथनोद्भवा !
कृष्णवर्णा रोगहन्त्री त्रिवर्णा सर्वकामदा ॥2॥

लक्ष्मीसखी नित्यशुद्धा सुदती भूमिपावनी !
हरिध्यानैकनिरता हरिपादकृतालया ॥3॥

पवित्ररूपिणी धन्या सुगन्धिन्यमृतोद्भवा !
सुरूपारोग्यदा तुष्टा शक्तित्रितयरूपिणी ॥4॥

देवी देवर्षिसंस्तुत्या कान्ता विष्णुमनःप्रिया !
भूतवेतालभीतिघ्नी महापातकनाशिनी ॥5॥

मनोरथप्रदा मेधा कान्तिर्विजयदायिनी !
शंखचक्रगदापद्मधारिणी कामरूपिणी ॥6॥

अपवर्गप्रदा श्यामा कृशमध्या सुकेशिनी !
वैकुण्ठवासिनी नन्दा बिंबोष्ठी कोकिलस्वना ॥7॥

कपिला निम्नगाजन्मभूमी आयुष्यदायिनी !
वनरूपा दुःखनाशी अविकारा चतुर्भुजा ॥8॥

गरुत्मद्वाहना शान्ता दान्ता विघ्ननिवारिणी !
विष्णुमूलिका पुष्टा त्रिवर्गफलदायिनी ॥9॥

महाशक्तिर्महामाया लक्ष्मीवाणीसुपूजिता !
सुमंगल्यर्चनप्रीता सौमङ्गल्यविवर्धिनी ॥10॥

चातुर्मासोत्सवाराध्या विष्णुसान्निध्यदायिनी !
उत्तानद्वादशीपूज्या सर्वदेवप्रपूजिता ॥11॥

गोपीरतिप्रदा नित्या निर्गुणा पार्वतीप्रिया !
अपमृत्युहरा राधाप्रिया मृगविलोचना ॥12॥

अम्लाना हंसगमना कमलासनवन्दिता !
भूलोकवासिनी शुद्धा रमकृष्णादिपूजिता ॥13॥

सीतापूज्या राममनःप्रिया नन्दनसंस्थिता !
सर्वतीर्थमयी मुक्ता लोकसृष्टिविधायिनी ॥14॥

प्रातर्दृश्या ग्लानिहन्त्री वैष्णवी सर्वसिद्धिदा !
नारायणी सन्ततिदा मूलमृद्धारिपावनी ॥15॥

अशोकवनिकासंस्था सीताध्याता निराश्रया !
गोमतीसरयूतीररोपिता कुटिलालका ॥16॥

अपात्रभक्ष्यपापघ्नी दानतोयविशुद्धिदा !
श्रुतिधारणसुप्रीता शुभा सर्वेष्टदायिनी ॥17॥
तुलसी माता की आरती

जय जय तुलसी माता,
सब जग की सुखदाता ।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

सब योगों के ऊपर,
सब लोगों के ऊपर,

रुज से रक्षा करके भव त्राता।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

बटु पुत्री है श्यामा,
सूर बल्ली है ग्राम्या,

विष्णु प्रिये जो तुमको सेवे,
सो नर तर जाता।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

हरि के शीश विराजत
त्रिभुवन से हो वंदित,

पतित जनों की तारिणि,
तुम हो विख्याता।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

लेकर जन्म विजन में आई
दिव्य भवन में,

मानव लोक तुम्हीं से
सुख संपत्ति पाता।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥

हरि को तुम अति प्यारी
श्याम वर्ण सुकुमारी,

प्रेम अजब है उनका
तुम से कैसा नाता।

॥ जय जय तुलसी माता। ॥


॥ इति श्री तुलसी आरती ॥

श्री तुलसी कवचम्


।। श्री गणेशाय नमः ।।


अस्य श्री तुलसीकवच स्तोत्रमंत्रस्य ।


श्री महादेव ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः ।


श्रीतुलसी देवता । मन ईप्सितकामनासिद्धयर्थं जपे विनियोगः ।


तुलसी श्रीमहादेवि नमः पंकजधारिणी ।
शिरो मे तुलसी पातु भालं पातु यशस्विनी ।। १ ।।

दृशौ मे पद्मनयना श्रीसखी श्रवणे मम ।
घ्राणं पातु सुगंधा मे मुखं च सुमुखी मम ।। २ ।।

जिव्हां मे पातु शुभदा कंठं विद्यामयी मम ।
स्कंधौ कह्वारिणी पातु हृदयं विष्णुवल्लभा ।। ३ ।।

पुण्यदा मे पातु मध्यं नाभि सौभाग्यदायिनी ।
कटिं कुंडलिनी पातु ऊरू नारदवंदिता ।। ४ ।।

जननी जानुनी पातु जंघे सकलवंदिता ।
नारायणप्रिया पादौ सर्वांगं सर्वरक्षिणी ।। ५ ।।

संकटे विषमे दुर्गे भये वादे महाहवे ।
नित्यं हि संध्ययोः पातु तुलसी सर्वतः सदा ।। ६ ।।

इतीदं परमं गुह्यं तुलस्याः कवचामृतम् ।
मर्त्यानाममृतार्थाय भीतानामभयाय च ।। ७ ।।

मोक्षाय च मुमुक्षूणां ध्यायिनां ध्यानयोगकृत् ।
वशाय वश्यकामानां विद्यायै वेदवादिनाम् ।। ८ ।।

द्रविणाय दरिद्राण पापिनां पापशांतये ।। ९ ।।

अन्नाय क्षुधितानां च स्वर्गाय स्वर्गमिच्छताम् ।
पशव्यं पशुकामानां पुत्रदं पुत्रकांक्षिणाम् ।। १० ।।

राज्यायभ्रष्टराज्यानामशांतानां च शांतये I
भक्त्यर्थं विष्णुभक्तानां विष्णौ सर्वांतरात्मनि ।। ११ ।।

जाप्यं त्रिवर्गसिध्यर्थं गृहस्थेन विशेषतः ।
उद्यन्तं चण्डकिरणमुपस्थाय कृतांजलिः ।। १२।।

तुलसीकानने तिष्टन्नासीनौ वा जपेदिदम् ।
सर्वान्कामानवाप्नोति तथैव मम संनिधिम् ।। १३ ।।

मम प्रियकरं नित्यं हरिभक्तिविवर्धनम् ।
या स्यान्मृतप्रजा नारी तस्या अंगं प्रमार्जयेत् ।। १४ ।।

सा पुत्रं लभते दीर्घजीविनं चाप्यरोगिणम् ।
वंध्याया मार्जयेदंगं कुशैर्मंत्रेण साधकः ।। १५ ।।

साSपिसंवत्सरादेव गर्भं धत्ते मनोहरम् ।
अश्वत्थेराजवश्यार्थी जपेदग्नेः सुरुपभाक ।। १६ ।।

पलाशमूले विद्यार्थी तेजोर्थ्यभिमुखो रवेः ।
कन्यार्थी चंडिकागेहे शत्रुहत्यै गृहे मम ।। १७ ।।

श्रीकामो विष्णुगेहे च उद्याने स्त्री वशा भवेत् ।
किमत्र बहुनोक्तेन शृणु सैन्येश तत्त्वतः ।। १८ ।।

यं यं काममभिध्यायेत्त तं प्राप्नोत्यसंशयम् ।
मम गेहगतस्त्वं तु तारकस्य वधेच्छया ।। १९ ।।

जपन् स्तोत्रं च कवचं तुलसीगतमानसः ।
मण्डलात्तारकं हंता भविष्यसि न संशयः ।। २० ।।

 श्री तुलसी चालीसा


॥ दोहा॥

जय जय तुलसी भगवती

सत्यवती सुखदानी।


नमो नमो हरि प्रेयसी

श्री वृन्दा गुन खानी॥


श्री हरि शीश बिरजिनी,

देहु अमर वर अम्ब।


जनहित हे वृन्दावनी

अब न करहु विलम्ब॥


॥ चौपाई ॥


धन्य धन्य श्री तुलसी माता।

महिमा अगम सदा श्रुति गाता॥


हरि के प्राणहु से तुम प्यारी।

हरीहीँ हेतु कीन्हो तप भारी॥


जब प्रसन्न है दर्शन दीन्ह्यो।

तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो॥


हे भगवन्त कन्त मम होहू।

दीन जानी जनि छाडाहू छोहु॥


सुनी लक्ष्मी तुलसी की बानी।

दीन्हो श्राप कध पर आनी॥


उस अयोग्य वर मांगन हारी।

होहू विटप तुम जड़ तनु धारी॥


सुनी तुलसी हीँ श्रप्यो तेहिं ठामा।

करहु वास तुहू नीचन धामा॥


दियो वचन हरि तब तत्काला।

सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला॥


समय पाई व्हौ रौ पाती तोरा।

पुजिहौ आस वचन सत मोरा॥


तब गोकुल मह गोप सुदामा।

तासु भई तुलसी तू बामा॥


कृष्ण रास लीला के माही।

राधे शक्यो प्रेम लखी नाही॥


दियो श्राप तुलसिह तत्काला।

नर लोकही तुम जन्महु बाला॥


यो गोप वह दानव राजा।

शङ्ख चुड नामक शिर ताजा॥


तुलसी भई तासु की नारी।

परम सती गुण रूप अगारी॥


अस द्वै कल्प बीत जब गयऊ।

कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ॥


वृन्दा नाम भयो तुलसी को।

असुर जलन्धर नाम पति को॥


करि अति द्वन्द अतुल बलधामा।

लीन्हा शंकर से संग्राम॥


जब निज सैन्य सहित शिव हारे।

मरही न तब हर हरिही पुकारे॥


पतिव्रता वृन्दा थी नारी।

कोऊ न सके पतिहि संहारी॥


तब जलन्धर ही भेष बनाई।

वृन्दा ढिग हरि पहुच्यो जाई॥


शिव हित लही करि कपट प्रसंगा।

कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा॥


भयो जलन्धर कर संहारा।

सुनी उर शोक उपारा॥


तिही क्षण दियो कपट हरि टारी।

लखी वृन्दा दुःख गिरा उचारी॥


जलन्धर जस हत्यो अभीता।

सोई रावन तस हरिही सीता॥


अस प्रस्तर सम ह्रदय तुम्हारा।

धर्म खण्डी मम पतिहि संहारा॥


यही कारण लही श्राप हमारा।

होवे तनु पाषाण तुम्हारा॥


सुनी हरि तुरतहि वचन उचारे।

दियो श्राप बिना विचारे॥


लख्यो न निज करतूती पति को।

छलन चह्यो जब  पार्वती को॥


जड़मति तुहु अस हो जड़रूपा।

जग मह तुलसी विटप अनूपा॥


धग्व रूप हम शालिग्रामा।

नदी गण्डकी बीच ललामा॥


जो तुलसी दल हमही चढ़ इहैं।

सब सुख भोगी परम पद पईहै॥


बिनु तुलसी हरि जलत शरीरा।

अतिशय उठत शीश उर पीरा॥


जो तुलसी दल हरि शिर धारत।

सो सहस्त्र घट अमृत डारत॥


तुलसी हरि मन रञ्जनी हारी।

रोग दोष दुःख भंजनी हारी॥


प्रेम सहित हरि भजन निरन्तर।

तुलसी राधा मंज नाही अन्तर॥


व्यन्जन हो छप्पनहु प्रकारा।

बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा॥


सकल तीर्थ तुलसी तरु छाही।

लहत मुक्ति जन संशय नाही॥


कवि सुन्दर इक हरि गुण गावत।

तुलसिहि निकट सहसगुण पावत॥


बसत निकट दुर्बासा धामा।

जो प्रयास ते पूर्व ललामा॥


पाठ करहि जो नित नर नारी।

होही सुख भाषहि त्रिपुरारी॥


॥ दोहा ॥

तुलसी चालीसा पढ़ही

तुलसी तरु ग्रह धारी।


दीपदान करि पुत्र फल

पावही बन्ध्यहु नारी॥


सकल दुःख दरिद्र हरि

हार ह्वै परम प्रसन्न।


आशिय धन जन लड़हि

ग्रह बसही पूर्णा अत्र॥


लाही अभिमत फल जगत मह

लाही पूर्ण सब काम।


जेई दल अर्पही तुलसी तंह

सहस बसही हरीराम॥


तुलसी महिमा नाम लख

तुलसी सूत सुखराम।


मानस चालीस रच्यो

जग महं तुलसीदास॥


॥ इति श्री तुलसी चालीसा ॥

तुलसी पूजा मंत्र || 

तुलसी तोड़ने का मंत्र || 
ॐ सुभद्राय नमः
ॐ सुप्रभाय नमः

मातस्तुलसि गोविन्द हृदयानन्द कारिणी । नारायणस्य पूजार्थं चिनोमि त्वां नमोस्तुते ।।


तुलसी जल अर्पित मंत्र || 
महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी । आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते ।
देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः ! नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये।।


तुलसी पूजा मंत्र || 
तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी।
धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया ।।
लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्।
तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया ।।