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Wednesday, March 17, 2021

 
श्री वामन स्तोत्रम् || 
अदितिरुवाच ।


यज्ञेश यज्ञपुरुषाच्युत तीर्थपाद


तीर्थश्रवश्श्रवण मङ्गलनामधेय ।

आपन्नलोकवृजिनोपशमोदाऽऽद्य शं नः
कृधीश भगवन्नसि दीननाथः ॥ १ ॥

विश्वाय विश्वभवनस्थिति सम्यमाय
स्वैरं गृहीतपुरुशक्तिगुणाय भूम्ने ।

स्वस्थाय शश्वदुपबृंहितवूर्णबोध-
व्यापादितात्मतमसे हरये नमस्ते ॥ २ ॥


आयुः परं वपुरभीष्टमतुल्यलक्ष्मी-
र्द्यौभूरसास्सकलयोगगुणास्त्रिवर्गः ।

ज्ञानं च केवलमनन्त भवन्ति तुष्टा-
त्त्वत्तो नृणां किमु सपत्नजयादिराशीः ॥ ३ ॥

|| इति श्रीमद्भागवते श्रीवामन स्तोत्रं ||
 गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र || 



श्रीशुक उवाच
” एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो ह्रदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राक्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥ ” १ ॥

गजेन्द्र उवाच
” ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभीधीमहि ॥ ” २ ॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्दे स्वयंभुवम् ॥ ३ ॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितम् ।
क्वचिद्विभांतं क्व च तत्तिरोहितम् ।।

अविद्धदृक् साक्ष्युभयम तदीक्षते ।।।
सआत्ममूलोऽवतु मां परात्पतरः ।। ४ ।।

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो ।
लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।।
तमस्तदा ऽ ऽ सीद् गहनं गभीरम् ।।।

यस्तस्य पारे ऽ भिविराजते विभुः ॥ ५ ॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुः ।
जन्तुः पुनः कोऽर्हति गंतुमीरितुम् ।।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो ।।।
दुरत्ययानुक्रमणः स माऽवतु ॥ ६ ॥


दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम् ।
विमुक्तसंगा मुनयः सुसाधवः ।।
चरंत्यलोकव्रतमव्रणं वने ।।।
भूतात्मभूतः सुह्रदः स मे गतिः ॥ ७ ॥


न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा ।
न नामरुपे गुणदोष एव वा ।।
तथापि लोकाप्ययसंभवाय यः ।।।
स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥ ८ ॥

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
अरुपायोरुरुपाय नम आश्र्चर्य कर्मणे ॥ ९ ॥

नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥ १० ॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्र्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ ११ ॥

नमः शांताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥ १२ ॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥ १३ ॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥ १४ ॥

नमो नमस्तेऽखिल कारणाय ।
निष्कारणायाद्भुत कारणाय ।।
सर्वागमाम्नायमहार्णवाय ।।।
नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥ १५ ॥

गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय ।
तत्क्षोभ-विस्फूर्जितमानसाय ।।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम ।।।
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥ १६ ॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय ।
मुक्ताय भुरिकरुणाय नमोऽलयाय ।।

स्वांशेनसर्वतनुभृत्मनसि-प्रतीत- ।।।
-प्रत्यग् दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥ १७ ॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैः ।
दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।।
मुक्तात्मभिः स्वह्रदये परिभाविताय ।।।
ज्ञानात्मने भगवते नमः ईश्र्वराय ॥ १८ ॥

यं धर्मकामार्थ-विमुक्तिकामाः ।
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।।
किंत्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययम् ।।।
करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥ १९ ॥

एकांतिनो यस्य न कंचनार्थम् ।
वांछन्ति ये वै भगवत् प्रपन्नाः ।।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलम् ।।।
गायन्त आनन्द समुद्रमग्नाः ॥ २० ॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेशम् ।
अव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूरम् ।।।
अनंतमाद्यं परिपूर्णमिडे ॥ २१ ॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्र्चराचराः ।
नामरुपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥ २२ ॥

यथार्चिषोऽग्ने सवितुर्गभस्तयोः ।
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः ।।
तथा यतोऽयं गुणसंप्रवाहो ।।।
बुद्धिर्मनः ख्रानि शरीरसर्गाः ॥ २३ ॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ ।
न स्त्री न षंढो न पुमान् न जन्तुः ।।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन् ।।।
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥ २४ ॥

जिजी विषे नाहमियामुया किम् ।
अन्तर्बहिश्र्चावृतयेभयोन्या ।।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवः ।।।
तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥ २५ ॥

सोऽहं विश्र्वसृजं विश्र्वमविश्र्वं विश्र्ववेदसम् ।
विश्र्वात्मानमजंब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥ २६ ॥

योगरंधितकर्माणो ह्रदि योग-विभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥ २७ ॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग- ।
-शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये ।।।
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ २८ ॥

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहं धिया हतम् ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवंतमितोऽस्म्यहम् ॥ २९ ॥

श्रीशुक उवाच
एवं गजेन्द्र मुपवर्णितनिर्विशेषम् ।
ब्रह्मादयो विविधलिंग भिदाभिमानाः ।।
नैते यदोपससृपुनिंखिलात्मकत्वात् ।।।
तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥ ३० ॥

तं तद्वदार्तमुपलभ्य जगन्निवासः ।
स्तोत्रं निशम्य दिविजै सह संस्तुवद्भिः ।।
छंदोमयेन गरुडेन समुह्यमानः ।।।
चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥ ३१ ॥

सोऽन्तः सरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो ।
दृष्टवा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् ।।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रात् ।।।
नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते ॥ ३२ ॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य ।
सग्राहमाशु सरसः कृपायोज्जहार ।।
ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रम् ।।।
संपश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम् ॥ ३३ ॥

योऽसौ ग्राहः स वै सद्यः परमाश्र्चर्य रुपधृक् ।
मुक्तो देवलशापेन हुहु-गंधर्व सत्तमः ।।
सोऽनुकंपित ईशेन परिक्रम्य प्रणम्य तम् ।।।
लोकस्य पश्यतो लोकं स्वमगान्मुक्त-किल्बिषः ॥ ३४ ॥

गजेन्द्रो भगवत्स्पर्शाद् विमुक्तोऽज्ञानबंधनात् ।
प्राप्तो भगवतो रुपं पीतवासाश्र्चतुर्भुजः ।।
एवं विमोक्ष्य गजयुथपमब्जनाभः ।।।
स्तेनापि पार्षदगति गमितेन युक्तः ॥ ३५ ॥

गंधर्वसिद्धविबुधैरुपगीयमान-
कर्माभ्दुतं स्वभवनं गरुडासनोऽगात् ॥ ३६ ॥
॥ इति श्रीमद् भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां अष्टमस्कन्धे गजेंन्द्रमोक्षणे तृतीयोऽध्यायः ॥

Saturday, February 20, 2021

श्री विष्णु मंत्र

1. Vishnu Moola Mantra

ॐ नमोः नारायणाय॥
Om Namoh Narayanaya॥


2. Vishnu Bhagawate Vasudevaya Mantra

ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय॥
Om Namoh Bhagawate Vasudevaya॥


3. Vishnu Gayatri Mantra

ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
Om Shri Vishnave Cha Vidmahe Vasudevaya Dhimahi।
Tanno Vishnuh Prachodayat॥


4. Vishnu Shantakaram Mantra

शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्
विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।

लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥

Shantakaram Bhujagashayanam Padmanabham Suresham
Vishvadharam Gaganasadrisham Meghavarnam Shubhangam।

Lakshmikantam Kamalanayanam Yogibhirdhyanagamyam
Vande Vishnum Bhavabhayaharam Sarvalokaikanatham॥


5. Mangalam Bhagwan Vishnu Mantra

मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुणध्वजः।
मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥

Mangalam Bhagwan Vishnuh, Mangalam Garunadhwajah।
Mangalam Pundari Kakshah, Mangalaya Tano Harih॥

Thursday, February 11, 2021

ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

जो ध्यावे फल पावे,
दुःख बिनसे मन का,
स्वामी दुःख बिनसे मन का ।
सुख सम्पति घर आवे,
सुख सम्पति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

मात पिता तुम मेरे,
शरण गहूं किसकी,
स्वामी शरण गहूं मैं किसकी ।
तुम बिन और न दूजा,
तुम बिन और न दूजा,
आस करूं मैं जिसकी ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम पूरण परमात्मा,
तुम अन्तर्यामी,
स्वामी तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर,
पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम करुणा के सागर,
तुम पालनकर्ता,
स्वामी तुम पालनकर्ता ।
मैं मूरख फलकामी,
मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राणपति,
स्वामी सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूं दयामय,
किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता,
ठाकुर तुम मेरे,
स्वामी रक्षक तुम मेरे ।
अपने हाथ उठाओ,
अपने शरण लगाओ,
द्वार पड़ा तेरे ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

विषय-विकार मिटाओ,
पाप हरो देवा,
स्वमी पाप(कष्ट) हरो देवा ।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
सन्तन की सेवा ॥

ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे ॥

विष्णु चालीसा 




विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥


।।चौपाई।।


नमो विष्णु भगवान खरारी,कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी,त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥1॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत,सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत,बैजन्ती माला मन मोहत ॥2॥

शंख चक्र कर गदा बिराजे,देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे,काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥3॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन,दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन,दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥4॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण,कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण,केवल आप भक्ति के कारण ॥5॥


धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा,तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा,रावण आदिक को संहारा ॥6॥

आप वाराह रूप बनाया,हरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया,चौदह रतनन को निकलाया ॥7॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया,रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया,असुरन को छवि से बहलाया ॥8॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया,मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया,भस्मासुर को रूप दिखाया ॥9॥

वेदन को जब असुर डुबाया,कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया,उसही कर से भस्म कराया ॥10॥

असुर जलन्धर अति बलदाई,शंकर से उन कीन्ह लडाई ।
हार पार शिव सकल बनाई,कीन सती से छल खल जाई ॥11॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी,बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी,वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥12॥


देखत तीन दनुज शैतानी,वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी,हना असुर उर शिव शैतानी ॥13॥

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे,हिरणाकुश आदिक खल मारे ।
गणिका और अजामिल तारे,बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥14॥

हरहु सकल संताप हमारे,कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे,दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥15॥

चहत आपका सेवक दर्शन,करहु दया अपनी मधुसूदन ।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन,होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥16॥

शीलदया सन्तोष सुलक्षण,विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।
करहुं आपका किस विधि पूजन,कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥17॥


करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण,कौन भांति मैं करहु समर्पण ।
सुर मुनि करत सदा सेवकाईहर्षित रहत परम गति पाई ॥18॥

दीन दुखिन पर सदा सहाई,निज जन जान लेव अपनाई ।
पाप दोष संताप नशाओ,भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥19॥

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ,निज चरनन का दास बनाओ ।
निगम सदा ये विनय सुनावै,पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥20॥

विष्णुजी के 108 नाम




1. नारायण : ईश्वर, परमात्मा2. विष्णु : हर जगह विराजमान रहने वाले

3. वषट्कार: यज्ञ से प्रसन्न होने वाले

4. भूतभव्यभवत्प्रभु: भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी

5. भूतकृत : सभी प्राणियों के रचयिता

6. भूतभृत : सभी प्राणियों का पोषण करने वाले

7. भाव : सम्पूर्ण अस्तित्व वाले

8. भूतात्मा : ब्रह्मांड के सभी प्राणियों की आत्मा में वास करने वाले

9. भूतभावन : ब्रह्मांड के सभी प्राणियों का पोषण करने वाले

10. पूतात्मा : शुद्ध छवि वाले प्रभु

11. परमात्मा : श्रेष्ठ आत्मा

12. मुक्तानां परमागति: मोक्ष प्रदान करने वाले

13. अव्यय: : हमेशा एक रहने वाले

14. पुरुष: : हर जन में वास करने वाले

15. साक्षी : ब्रह्मांड की सभी घटनाओं के साक्षी

16. क्षेत्रज्ञ: : क्षेत्र के ज्ञाता

17. गरुड़ध्वज: गरुड़ पर सवार होने वाले

18. योग: : श्रेष्ठ योगी

19. योगाविदां नेता : सभी योगियों का स्वामी

20. प्रधानपुरुषेश्वर : प्रकृति और प्राणियों के भगवान

21. नारसिंहवपुष: : नरसिंह रूप धरण करने वाले

22. श्रीमान् : देवी लक्ष्मी के साथ रहने वाले

23. केशव : सुंदर बाल वाले

24. पुरुषोत्तम : श्रेष्ठ पुरुष

25. सर्व : संपूर्ण या जिसमें सब चीजें समाहित हों

26. शर्व : बाढ़ में सब कुछ नाश करने वाले

27. शिव : सदैव शुद्ध रहने वाले

28. स्थाणु : स्थिर रहने वाले

29. भूतादि : सभी को जीवन देने वाले

30. निधिरव्यय : अमूल्य धन के समान

31. सम्भव : सभी घटनाओं में स्वामी

32. भावन : भक्तों को सब कुछ देने वाले

33. भर्ता : सम्पूर्ण ब्रह्मांड के संचालक

34. प्रभव : सभी चीजों में उपस्थित होने वाले

35. प्रभु : सर्वशक्तिमान प्रभु

36. ईश्वर : पूरे ब्रह्मांड पर अधिपति

37. स्वयम्भू : स्वयं प्रकट होने वाले

38. शम्भु : खुशियां देने वाले

39. आदित्य : देवी अदिति के पुत्र

40. पुष्कराक्ष : कमल जैसे नयन वाले

41. महास्वण : वज्र की तरह स्वर वाले

42. अनादिनिधन : जिनका न आदि है एयर न अंत

43. धाता : सभी का समर्थन करने वाले

44. विधाता : सभी कार्यों व परिणामों की रचना करने वाले

45. धातुरुत्तम : ब्रह्मा से भी महान

46. अप्रेमय : नियम व परिभाषाओं से परे

47. हृषीकेशा : सभी इंद्रियों के स्वामी

48. पद्मनाभ : जिनके पेट से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई

49. अमरप्रभु : अमर रहने वाले

50. विश्वकर्मा : ब्रह्मांड के रचयिता

51. मनु : सभी विचार के दाता

52. त्वष्टा : बड़े को छोटा करने वाले

53. स्थविष्ठ : मुख्य

54. स्थविरो ध्रुव : प्राचीन देवता

55. अग्राह्य : मांसाहार का त्याग करने वाले

56. शाश्वत : हमेशा अवशेष छोड़ने वाले

57. कृष्ण : काले रंग वाले

58. लोहिताक्ष : लाल आँखों वाले

59. प्रतर्दन : बाढ़ के विनाशक

60. प्रभूत : धन और ज्ञान के दाता

61. त्रिककुब्धाम : सभी दिशाओं के भगवान

62. पवित्रां : हृदया पवित्र करने वाले

63. मंगलपरम् : श्रेष्ठ कल्याणकारी

64. ईशान : हर जगह वास करने वाले

65. प्राणद : प्राण देने वाले

66. प्राण : जीवन के स्वामी

67. ज्येष्ठ : सबसे बड़े प्रभु

68. श्रेष्ठ : सबसे महान

69. प्रजापति : सभी के मुख्य

70. हिरण्यगर्भ : विश्व के गर्भ में वास करने वाले

71. भूगर्भ : खुद के भीतर पृथ्वी का वहन करने वाले

72. माधव : देवी लक्ष्मी के पति

73. मधुसूदन : रक्षक मधु के विनाशक

74. ईश्वर : सबको नियंत्रित करने वाले

75. विक्रमी : सबसे साहसी भगवान

76. धन्वी : श्रेष्ठ धनुष- धारी

77. मेधावी : सर्वज्ञाता

78. विक्रम : ब्रह्मांड को मापने वाले

79. क्रम : हर जगह वास करने वाले

80. अनुत्तम : श्रेष्ठ ईश्वर

81. दुराधर्ष : सफलतापूर्वक हमला न करने वाले

82. कृतज्ञ : अच्छाई- बुराई का ज्ञान देने वाले

83. कृति : कर्मों का फल देने वाले

84. आत्मवान : सभी मनुष्य में वास करने वाले

85. सुरेश : देवों के देव

86. शरणम : शरण देने वाले

87. शर्म :

88. विश्वरेता : ब्रह्मांड के रचयिता

89. प्रजाभव : भक्तों के अस्तित्व के लिए अवतार लेने वाले

90. अह्र : दिन की तरह चमकने वाले

91. सम्वत्सर : अवतार लेने वाले

92. व्याल : नाग द्वारा कभी न पकड़े जाने वाले

93. प्रत्यय : ज्ञान का अवतार कहे जाने वाले

94. सर्वदर्शन : सब कुछ देखने वाले

95. अज : जिनका जन्म नहीं हुआ

96. सर्वेश्वर : सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी

97. सिद्ध : सब कुछ करने वाले

98. सिद्धि : कार्यों के प्रभाव देने वाले

99. सर्वादि : सभी क्रियाओं के प्राथमिक कारण

100. अच्युत : कभी न चूकने वाले

101. वृषाकपि: धर्म और वराह का अवतार लेने वाले

102. अमेयात्मा: जिनका कोई आकार नहीं है।

103. सर्वयोगविनि: सभी योगियों के स्वामी

104. वसु : सभी प्राणियों में रहने वाले

105. वसुमना: सौम्य हृदय वाले

106. सत्य : सत्य का समर्थन करने वाले

107. समात्मा: सभी के लिए एक जैसे

108. सममित: सभी प्राणियों में असीमित रहने वाले