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Wednesday, February 17, 2021

गुरू ग्रह के मंत्र || 


गुरू वैदिक मंत्र || 

“ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु ।

यद्दीदयच्दवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्”।।


गुरू तांत्रिक मंत्र ||

 “ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः”।


गुरू एकाक्षरी बीज मंत्र || 

 “ॐ बृं बृहस्पतये नम:” ।।

“ऊं गुं गुरुवाये नम:” 


गुरू का पौराणिक मंत्र ||

“ॐ देवानां च ऋषीणां च गुरु कांचन संन्निभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्” ।।


गुरू के अन्य मंत्र :

“ॐ ऐं श्रीं बृहस्पतये नम:॥”

“ॐ गुं गुरवे नम:॥”

“ॐ क्लीं बृहस्पतये नम:॥”

“ॐ ह्रीं क्लीं हूं बृहस्पतये नमः


॥”गुरू गायत्री मंत्र || 

“ॐ अंगिरो जाताय विद्महे वाचस्पतये धीमहि तन्नो गुरु प्रचोदयात्” ।।

Thursday, February 11, 2021

कृष्णाष्टकम् || Krishna Ashtakam || Shri Krishna Ashtakam


श्रियाश्लिष्टो विष्णुः स्थिरचरवपुर्वेदविषयो,
धियां साक्षी शुद्धो हरिरसुरहन्ताब्जनयनः ।


गदी शङ्खी चक्री विमलवनमाली स्थिररुचिः,
शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ १ ॥


यतः सर्वं जातं वियदनिलमुख्यं जगदिदं,
स्थितौ निःशेषं योऽवति निजसुखांशेन मधुहा ।


लये सर्वं स्वस्मिन् हरति कलया यस्तु स विभुः,
शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ २ ॥


असूनायम्यादौ यमनियममुख्यैः सुकरणैः,
निरुध्येदं चित्तं हृदि विलयमानीय सकलम् ।


यमीड्यं पश्यन्ति प्रवरमतयो मायिनमसौ,
शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ३ ॥


पृथिव्यां तिष्ठन् यो यमयति महीं वेद न धरा,
यमित्यादौ वेदो वदति जगतामीशममलम् ।


नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसौ,
शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ४ ॥


महेन्द्रादिर्देवो जयति दितिजान्यस्य बलतो,
न कस्य स्वातन्त्र्यं क्वचिदपि कृतौ यत्कृतिमृते ।


बलारातेर्गर्वं परिहरति योऽसौ विजयिनः,
शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ५ ॥


विना यस्य ध्यानं व्रजति पशुतां सूकरमुखाम्,
विना यस्य ज्ञानं जनिमृतिभयं याति जनता ।


विना यस्य स्मृत्या कृमिशतजनिं याति स विभुः,
शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ६ ॥


नरातङ्कोत्तङ्कः शरणशरणो भ्रान्तिहरणो,
घनश्यामो वामो व्रजशिशुवयस्योऽर्जुनसखः ।


स्वयंभूर्भूतानां जनक उचिताचारसुखदः,
शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ७ ॥


यदा धर्मग्लानिर्भवति जगतां क्षोभणकरी,
तदा लोकस्वामी प्रकटितवपुः सेतुधृगजः ।


सतां धाता स्वच्छो निगमगणगीतो व्रजपतिः,
शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ८ ॥


इति हरिरखिलात्माराधितः शङ्करेण,
श्रुतिविशदगुणोऽसौ मातृमोक्षार्थमाद्यः ।


यतिवरनिकटे श्रीयुक्त आविर्बभूव,
स्वगुणवृत उदारः शङ्खचक्राब्जहस्तः ॥ ९ ॥
ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

जो ध्यावे फल पावे,
दुःख बिनसे मन का,
स्वामी दुःख बिनसे मन का ।
सुख सम्पति घर आवे,
सुख सम्पति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

मात पिता तुम मेरे,
शरण गहूं किसकी,
स्वामी शरण गहूं मैं किसकी ।
तुम बिन और न दूजा,
तुम बिन और न दूजा,
आस करूं मैं जिसकी ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम पूरण परमात्मा,
तुम अन्तर्यामी,
स्वामी तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर,
पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम करुणा के सागर,
तुम पालनकर्ता,
स्वामी तुम पालनकर्ता ।
मैं मूरख फलकामी,
मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राणपति,
स्वामी सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूं दयामय,
किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता,
ठाकुर तुम मेरे,
स्वामी रक्षक तुम मेरे ।
अपने हाथ उठाओ,
अपने शरण लगाओ,
द्वार पड़ा तेरे ॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

विषय-विकार मिटाओ,
पाप हरो देवा,
स्वमी पाप(कष्ट) हरो देवा ।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
सन्तन की सेवा ॥

ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे ॥

विष्णु चालीसा 




विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥


।।चौपाई।।


नमो विष्णु भगवान खरारी,कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी,त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥1॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत,सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत,बैजन्ती माला मन मोहत ॥2॥

शंख चक्र कर गदा बिराजे,देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे,काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥3॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन,दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन,दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥4॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण,कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण,केवल आप भक्ति के कारण ॥5॥


धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा,तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा,रावण आदिक को संहारा ॥6॥

आप वाराह रूप बनाया,हरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया,चौदह रतनन को निकलाया ॥7॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया,रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया,असुरन को छवि से बहलाया ॥8॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया,मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया,भस्मासुर को रूप दिखाया ॥9॥

वेदन को जब असुर डुबाया,कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया,उसही कर से भस्म कराया ॥10॥

असुर जलन्धर अति बलदाई,शंकर से उन कीन्ह लडाई ।
हार पार शिव सकल बनाई,कीन सती से छल खल जाई ॥11॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी,बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी,वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥12॥


देखत तीन दनुज शैतानी,वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी,हना असुर उर शिव शैतानी ॥13॥

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे,हिरणाकुश आदिक खल मारे ।
गणिका और अजामिल तारे,बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥14॥

हरहु सकल संताप हमारे,कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे,दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥15॥

चहत आपका सेवक दर्शन,करहु दया अपनी मधुसूदन ।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन,होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥16॥

शीलदया सन्तोष सुलक्षण,विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।
करहुं आपका किस विधि पूजन,कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥17॥


करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण,कौन भांति मैं करहु समर्पण ।
सुर मुनि करत सदा सेवकाईहर्षित रहत परम गति पाई ॥18॥

दीन दुखिन पर सदा सहाई,निज जन जान लेव अपनाई ।
पाप दोष संताप नशाओ,भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥19॥

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ,निज चरनन का दास बनाओ ।
निगम सदा ये विनय सुनावै,पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥20॥

विष्णुजी के 108 नाम




1. नारायण : ईश्वर, परमात्मा2. विष्णु : हर जगह विराजमान रहने वाले

3. वषट्कार: यज्ञ से प्रसन्न होने वाले

4. भूतभव्यभवत्प्रभु: भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी

5. भूतकृत : सभी प्राणियों के रचयिता

6. भूतभृत : सभी प्राणियों का पोषण करने वाले

7. भाव : सम्पूर्ण अस्तित्व वाले

8. भूतात्मा : ब्रह्मांड के सभी प्राणियों की आत्मा में वास करने वाले

9. भूतभावन : ब्रह्मांड के सभी प्राणियों का पोषण करने वाले

10. पूतात्मा : शुद्ध छवि वाले प्रभु

11. परमात्मा : श्रेष्ठ आत्मा

12. मुक्तानां परमागति: मोक्ष प्रदान करने वाले

13. अव्यय: : हमेशा एक रहने वाले

14. पुरुष: : हर जन में वास करने वाले

15. साक्षी : ब्रह्मांड की सभी घटनाओं के साक्षी

16. क्षेत्रज्ञ: : क्षेत्र के ज्ञाता

17. गरुड़ध्वज: गरुड़ पर सवार होने वाले

18. योग: : श्रेष्ठ योगी

19. योगाविदां नेता : सभी योगियों का स्वामी

20. प्रधानपुरुषेश्वर : प्रकृति और प्राणियों के भगवान

21. नारसिंहवपुष: : नरसिंह रूप धरण करने वाले

22. श्रीमान् : देवी लक्ष्मी के साथ रहने वाले

23. केशव : सुंदर बाल वाले

24. पुरुषोत्तम : श्रेष्ठ पुरुष

25. सर्व : संपूर्ण या जिसमें सब चीजें समाहित हों

26. शर्व : बाढ़ में सब कुछ नाश करने वाले

27. शिव : सदैव शुद्ध रहने वाले

28. स्थाणु : स्थिर रहने वाले

29. भूतादि : सभी को जीवन देने वाले

30. निधिरव्यय : अमूल्य धन के समान

31. सम्भव : सभी घटनाओं में स्वामी

32. भावन : भक्तों को सब कुछ देने वाले

33. भर्ता : सम्पूर्ण ब्रह्मांड के संचालक

34. प्रभव : सभी चीजों में उपस्थित होने वाले

35. प्रभु : सर्वशक्तिमान प्रभु

36. ईश्वर : पूरे ब्रह्मांड पर अधिपति

37. स्वयम्भू : स्वयं प्रकट होने वाले

38. शम्भु : खुशियां देने वाले

39. आदित्य : देवी अदिति के पुत्र

40. पुष्कराक्ष : कमल जैसे नयन वाले

41. महास्वण : वज्र की तरह स्वर वाले

42. अनादिनिधन : जिनका न आदि है एयर न अंत

43. धाता : सभी का समर्थन करने वाले

44. विधाता : सभी कार्यों व परिणामों की रचना करने वाले

45. धातुरुत्तम : ब्रह्मा से भी महान

46. अप्रेमय : नियम व परिभाषाओं से परे

47. हृषीकेशा : सभी इंद्रियों के स्वामी

48. पद्मनाभ : जिनके पेट से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई

49. अमरप्रभु : अमर रहने वाले

50. विश्वकर्मा : ब्रह्मांड के रचयिता

51. मनु : सभी विचार के दाता

52. त्वष्टा : बड़े को छोटा करने वाले

53. स्थविष्ठ : मुख्य

54. स्थविरो ध्रुव : प्राचीन देवता

55. अग्राह्य : मांसाहार का त्याग करने वाले

56. शाश्वत : हमेशा अवशेष छोड़ने वाले

57. कृष्ण : काले रंग वाले

58. लोहिताक्ष : लाल आँखों वाले

59. प्रतर्दन : बाढ़ के विनाशक

60. प्रभूत : धन और ज्ञान के दाता

61. त्रिककुब्धाम : सभी दिशाओं के भगवान

62. पवित्रां : हृदया पवित्र करने वाले

63. मंगलपरम् : श्रेष्ठ कल्याणकारी

64. ईशान : हर जगह वास करने वाले

65. प्राणद : प्राण देने वाले

66. प्राण : जीवन के स्वामी

67. ज्येष्ठ : सबसे बड़े प्रभु

68. श्रेष्ठ : सबसे महान

69. प्रजापति : सभी के मुख्य

70. हिरण्यगर्भ : विश्व के गर्भ में वास करने वाले

71. भूगर्भ : खुद के भीतर पृथ्वी का वहन करने वाले

72. माधव : देवी लक्ष्मी के पति

73. मधुसूदन : रक्षक मधु के विनाशक

74. ईश्वर : सबको नियंत्रित करने वाले

75. विक्रमी : सबसे साहसी भगवान

76. धन्वी : श्रेष्ठ धनुष- धारी

77. मेधावी : सर्वज्ञाता

78. विक्रम : ब्रह्मांड को मापने वाले

79. क्रम : हर जगह वास करने वाले

80. अनुत्तम : श्रेष्ठ ईश्वर

81. दुराधर्ष : सफलतापूर्वक हमला न करने वाले

82. कृतज्ञ : अच्छाई- बुराई का ज्ञान देने वाले

83. कृति : कर्मों का फल देने वाले

84. आत्मवान : सभी मनुष्य में वास करने वाले

85. सुरेश : देवों के देव

86. शरणम : शरण देने वाले

87. शर्म :

88. विश्वरेता : ब्रह्मांड के रचयिता

89. प्रजाभव : भक्तों के अस्तित्व के लिए अवतार लेने वाले

90. अह्र : दिन की तरह चमकने वाले

91. सम्वत्सर : अवतार लेने वाले

92. व्याल : नाग द्वारा कभी न पकड़े जाने वाले

93. प्रत्यय : ज्ञान का अवतार कहे जाने वाले

94. सर्वदर्शन : सब कुछ देखने वाले

95. अज : जिनका जन्म नहीं हुआ

96. सर्वेश्वर : सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी

97. सिद्ध : सब कुछ करने वाले

98. सिद्धि : कार्यों के प्रभाव देने वाले

99. सर्वादि : सभी क्रियाओं के प्राथमिक कारण

100. अच्युत : कभी न चूकने वाले

101. वृषाकपि: धर्म और वराह का अवतार लेने वाले

102. अमेयात्मा: जिनका कोई आकार नहीं है।

103. सर्वयोगविनि: सभी योगियों के स्वामी

104. वसु : सभी प्राणियों में रहने वाले

105. वसुमना: सौम्य हृदय वाले

106. सत्य : सत्य का समर्थन करने वाले

107. समात्मा: सभी के लिए एक जैसे

108. सममित: सभी प्राणियों में असीमित रहने वाले
गुरु स्तोत्र || Guru Stotram


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।


गुरुस्साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥१॥


अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।


चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥२॥


अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरं।


तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥३॥


अनेकजन्मसंप्राप्तकर्मबन्धविदाहिने ।


आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥४॥


मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः।


ममात्मासर्वभूतात्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ॥५॥


बर्ह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्,


द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।


एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं,


भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥६॥
॥ श्रीगुरु अष्टोत्तरशतनामावली ॥


ॐ सद्गुरवे नमः ॥
ॐ अज्ञाननाशकाय नमः ॥
ॐ अदम्भिने नमः ॥
ॐ अद्वैतप्रकाशकाय नमः ॥
ॐ अनपेक्षाय नमः ॥
ॐ अनसूयवे नमः ॥
ॐ अनुपमाय नमः ॥


ॐ अभयप्रदात्रे नमः ॥
ॐ अमानिने नमः ॥
ॐ अहिंसामूर्तये नमः ॥
ॐ अहैतुक-दयासिन्धवे नमः ॥
ॐ अहंकार-नाशकाय नमः ॥


ॐ अहंकार-वर्जिताय नमः ॥
ॐ आचार्येन्द्राय नमः ॥
ॐ आत्मसन्तुष्टाय नमः ॥
ॐ आनन्दमूर्तये नमः ॥
ॐ आर्जवयुक्ताय नमः ॥
ॐ उचितवाचे नमः ॥


ॐ उत्साहिने नमः ॥
ॐ उदासीनाय नमः ॥
ॐ उपरताय नमः ॥
ॐ ऐश्वर्ययुक्ताय नमः ॥
ॐ कृतकृत्याय नमः ॥
ॐ क्षमावते नमः ॥
ॐ गुणातीताय नमः ॥


ॐ चारुवाग्विलासाय नमः ॥
ॐ चारुहासाय नमः ॥
ॐ छिन्नसंशयाय नमः ॥
ॐ ज्ञानदात्रे नमः ॥
ॐ ज्ञानयज्ञतत्पराय नमः ॥
ॐ तत्त्वदर्शिने नमः ॥
ॐ तपस्विने नमः ॥
ॐ तापहराय नमः ॥
ॐ तुल्यनिन्दास्तुतये नमः ॥
ॐ तुल्यप्रियाप्रियाय नमः ॥


ॐ तुल्यमानापमानाय नमः ॥
ॐ तेजस्विने नमः ॥
ॐ त्यक्तसर्वपरिग्रहाय नमः ॥
ॐ त्यागिने नमः ॥
ॐ दक्षाय नमः ॥
ॐ दान्ताय नमः ॥
ॐ दृढव्रताय नमः ॥


ॐ दोषवर्जिताय नमः ॥
ॐ द्वन्द्वातीताय नमः ॥
ॐ धीमते नमः ॥
ॐ धीराय नमः ॥
ॐ नित्यसन्तुष्टाय नमः ॥


ॐ निरहंकाराय नमः ॥
ॐ निराश्रयाय नमः ॥
ॐ निर्भयाय नमः ॥
ॐ निर्मदाय नमः ॥
ॐ निर्ममाय नमः ॥


ॐ निर्मलाय नमः ॥
ॐ निर्मोहाय नमः ॥
ॐ निर्योगक्षेमाय नमः ॥
ॐ निर्लोभाय नमः ॥
ॐ निष्कामाय नमः ॥


ॐ निष्क्रोधाय नमः ॥
ॐ निःसंगाय नमः ॥
ॐ परमसुखदाय नमः ॥
ॐ पण्डिताय नमः ॥
ॐ पूर्णाय नमः ॥
ॐ प्रमाणप्रवर्तकाय नमः ॥
ॐ प्रियभाषिणे नमः ॥
ॐ ब्रह्मकर्मसमाधये नमः ॥


ॐ ब्रह्मात्मनिष्ठाय नमः ॥
ॐ ब्रह्मात्मविदे नमः ॥
ॐ भक्ताय नमः ॥
ॐ भवरोगहराय नमः ॥
ॐ भुक्तिमुक्तिप्रदात्रे नमः ॥
ॐ मंगलकर्त्रे नमः ॥
ॐ मधुरभाषिणे नमः ॥


ॐ महात्मने नमः ॥
ॐ महावाक्योपदेशकर्त्रे नमः ॥
ॐ मितभाषिणे नमः ॥
ॐ मुक्ताय नमः ॥
ॐ मौनिने नमः ॥
ॐ यतचित्ताय नमः ॥


ॐ यतये नमः ॥
ॐ यद्दृच्छालाभसन्तुष्टाय नमः ॥
ॐ युक्ताय नमः ॥
ॐ रागद्वेषवर्जिताय नमः ॥
ॐ विदिताखिलशास्त्राय नमः ॥
ॐ विद्याविनयसम्पन्नाय नमः ॥
ॐ विमत्सराय नमः ॥


ॐ विवेकिने नमः ॥
ॐ विशालहृदयाय नमः ॥
ॐ व्यवसायिने नमः ॥
ॐ शरणागतवत्सलाय नमः ॥
ॐ शान्ताय नमः ॥
ॐ शुद्धमानसाय नमः ॥


ॐ शिष्यप्रियाय नमः ॥
ॐ श्रद्धावते नमः ॥
ॐ श्रोत्रियाय नमः ॥
ॐ सत्यवाचे नमः ॥
ॐ सदामुदितवदनाय नमः ॥
ॐ समचित्ताय नमः ॥
ॐ समाधिक-वर्जिताय नमः ॥
ॐ समाहितचित्ताय नमः ॥
ॐ सर्वभूतहिताय नमः ॥


ॐ सिद्धाय नमः ॥
ॐ सुलभाय नमः ॥
ॐ सुशीलाय नमः ॥
ॐ सुहृदे नमः ॥
ॐ सूक्ष्मबुद्धये नमः ॥
ॐ संकल्पवर्जिताय नमः ॥
ॐ सम्प्रदायविदे नमः ॥
ॐ स्वतन्त्राय नमः ॥
श्री बृहस्‍पति देव जी की आरती ||


जय बृहस्पति देवा, ॐ जय बृहस्पति देवा।

छिन छिन भोग लगाऊं, कदली फल मेवा॥

ॐ जय बृहस्पति देवा ।।१।।


तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी।

जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी॥

ॐ जय बृहस्पति देवा।।२।।


चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता।

सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता।।

ॐ जय बृहस्पति देवा।।३।।


तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े।

प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े॥

ॐ जय बृहस्पति देवा।।४।।


दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी।

पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी॥

ॐ जय बृहस्पति देवा।।५।।


सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारी।

विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी॥

ॐ जय बृहस्पति देवा।।६।।


जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे।

जेष्‍ठानंद आनंदकर, सो निश्चय पावे॥

ॐ जय बृहस्पति देवा।।७।।


सब बोलो विष्णु भगवान की जय!

बोलो बृहस्पतिदेव की जय!!