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Thursday, May 13, 2021

Shri Ganapati aarti


सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची ।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची ॥

सर्वांगी सुंदर उटि शेंदुराची ।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ॥१॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥ध्रु०॥

रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा ।
चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा ॥

हिरेजडीत मुकुुट शोभतो बरा ।
रुणझुणती नूपरें चरणीं घागरिया ॥ जय० ॥२॥

माथा मुकुट मणी कानी कुंडले ।
सोंड दोंदावरी शेंदुर चर्चिले ।।

नागबंद सोंड-दोंद मिराविले ।
विश्वरूप तया मोरयाचे देखिले ॥ जय० ॥३॥

चतुर्भुज गणराज बाही बाहुटे ।
खाजयाचे लाडू करुनी गोमटे ।।

सुवर्णाचे ताटी शर्करा घृत ।
अर्पी तो गणराज विघ्ने वारीतो ॥ जय० ॥४॥

छत्रे चामरे तुजला मिरविती ।
उंदीराचे वाहन तुजला गणपती ।।

ऐसा तु कलीयुगी सकळीक पाहसी ।
आनंदे भक्तासी प्रसन्न होसी ॥ जय० ॥५॥

ता ता धि मि किट धि मि किट नाचे गणपती ।
ईश्वर पार्वती कौतुक पाहती ।।

ताल मृदंग वीणा घोर उमटती ।
त्यांचे छंदे करुनी नाचे गणपती ॥ जय० ॥६॥

लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना ।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना ॥

दास रामाचा वाट पाहे सदना ।
संकटीं पावावें निर्वाणीं रक्षावें सुरवर वंदना

॥ जय ० ॥ ७ ॥
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती

Wednesday, February 17, 2021

 बुध स्तोत्र || 


पीताम्बर: पीतवपु किरीटी, चतुर्भुजो देवदु:खापहर्ता ।

धर्मस्य धृक सोमसुत: सदा मे, सिंहाधिरुढ़ो वरदो बुधश्च ।।1।।


प्रियंगुकनकश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम ।

सौम्यं सौम्यगुणोपेतं नमामि शशिनन्दनम ।।2।।


सोमसुनुर्बुधश्चैव सौम्य: सौम्यगुणान्वित: ।

सदा शान्त: सदा क्षेमो नमामि शशिनन्दनम ।।3।।


उत्पातरूपी जगतां चन्द्रपुत्रो महाद्युति: ।

सूर्यप्रियकरोविद्वान पीडां हरतु मे बुधं ।।4।।


शिरीषपुष्पसंकाशं कपिलीशो युवा पुन: ।

सोमपुत्रो बुधश्चैव सदा शान्तिं प्रयच्छतु ।।5।।


श्याम: शिरालश्चकलाविधिज्ञ:, कौतूहली कोमलवाग्विलासी ।

रजोधिको मध्यमरूपधृक स्या-दाताम्रनेत्रो द्विजराजपुत्र: ।।6।।


अहो चन्द्रासुत श्रीमन मागधर्मासमुदभव: ।

अत्रिगोत्रश्चतुर्बाहु: खड्गखेटकधारक: ।।7।।


गदाधरो नृसिंहस्थ: स्वर्णनाभसमन्वित: ।

केतकीद्रुमपत्राभ: इन्द्रविष्णुप्रपूजित: ।।8।।


ज्ञेयो बुध: पण्डितश्च रोहिणेयश्च सोमज: ।

कुमारो राजपुत्रश्च शैशवे शशिनन्दन: ।।9।।


गुरुपुत्रश्च तारेयो विबुधो बोधनस्तथा ।

सौम्य: सौम्यगुणोपेतो रत्नदानफलप्रद: ।।10।।


एतानि बुधनामानि प्रात: काले पठेन्नर: ।

बुद्धिर्विवृद्धितां याति बुधपीडा न जायते ।।11।।


।।  इति मंत्रमहार्णवे बुधस्तोत्रम  ।।

 बुध ग्रह के मंत्र || 


बुध ग्रह के वैदिक मंत्र || 

ऊँ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते स सृजेथामयं च । 

अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ।।


बुध ग्रह के तांत्रिक मंत्र || 

ऊँ ऎं स्त्रीं श्रीं बुधाय नम:

ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:

ऊँ स्त्रीं स्त्रीं बुधाय नम:


बुध ग्रह एकाक्षरी बीज मंत्र || 

ऊँ बुं बुधाय नम:


बुध ग्रह का पौराणिक मंत्र |

प्रियंगुकलिकाश्यामं रुपेणाप्रतिमं बुधम । सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम ।।


बुध ग्रह का गायत्री मंत्र || 

ऊँ चन्द्रपुत्राय विदमहे रोहिणी प्रियाय धीमहि तन्नोबुध: प्रचोदयात ।


Monday, February 15, 2021

गणेश मंत्र


1. वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा .

2. ॐ एकदन्ताय विद्धमहे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ति प्रचोदयात् .

3. ॐ लम्बोदराय नमः .

4. ऊँ गं गणपतये नम: .

5. ऊँ श्री गणेशाय नम: .

6. ऊँ नमो भगवते गजाननाय .

ऊँ वक्रतुण्डाय हुम् .

7. ॐ नमो सिद्धि विनायकाय सर्व कार्य कर्त्रे सर्व विघ्न प्रशमनाय सर्व राज्य वश्यकरणाय सर्वजन सर्वस्त्री पुरुष आकर्षणाय श्रीं ॐ स्वाहा ॥

8. ऊँ हीं श्रीं क्लीं गौं ग: श्रीन्महागणधिपतये नम:। ऊँ ।

9. हीं श्रीं क्लीं गौं वरमूर्र्तये नम: ।

ऊँ गं गणपतये नम:।

10. हीं श्रीं क्लीं नमो भगवते गजाननाय ।

ऊँ वक्रतुण्डाय हुम् ।

11.ॐ विघ्ननाशाय नमः .

12. ॐ सुमुखाय नमः

13. ॐ गजकर्णकाय नमः

14. ॐ विनायकाय नमः

15. ॐ गणेश ऋणं छिन्धि वरेण्यं हुं नमः फट्॥

16. ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा॥ एकदन्ताय विद्महे । वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
आरती गणेश जी की

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥


एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे पे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥


अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥


हार चढ़ै , फूल चढ़ै और चढ़ै मेवा।
लडुअन का भोग लागे, सन्त करें सेवा॥


दीनन की लाज राखो शंभु सुतवारी।
कामना को पूरा करो जग बलिहारी॥


जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
श्री गणेश चालीसा 


दोहा
जय गणपति सद्‌गुण सदन, करि वर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥


चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू,
मंगल भरण करण शुभ काजू।

जय गजबदन सदन सुखदाता,
विश्वविनायक बुद्धिविधाता।

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन,
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन।

राजत मणि मुक्तन उर माला,
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला।

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं,
मोदक भोग सुगन्धित फूलं।

सुन्दर पीताम्बर तन साजित,
चरण पादुका मुनि मन राजित।

धनि शिव सुवन षडानन भ्राता,
गौरी ललन विश्व विखयाता।

ऋद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे,
मूषक वाहन सोहत द्वारे।

कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी,
अति शुचि पावन मंगलकारी।

एक समय गिरिराज कुमारी,
पुत्र हेतु तप कीन्हों भारी।


भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा,
तब पहुच्यों तुम धरि द्विज रूपा।

अतिथि जानि के गौरी सुखारी,
बहु विधि सेवा करी तुम्हारी।

अति प्रसन्न ह्‌वै तुम वर दीन्हा,
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा।

मिलहिं पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला,
बिना गर्भ धारण यहि काला।

गणनायक गुण ज्ञान निधाना,
पूजित प्रथम रूप भगवाना।

अस कहि अन्तर्धान रूप ह्‌वै,
पलना पर बालक स्वरूप ह्‌वै।

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना,
लखि मुख सुख नहिं गौनी समाना।

सकल मगन सुख मंगल गावहिं,
नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं।

शम्भु उमा बहु दान लुटावहिं,
सुर मुनिजन तुस देखन आवहिं।

लखि अति आनन्द मंगल साजा,
देखन भी आए शनि राजा।

निज अवगुण गनि शनि मन माहीं,
बालक देखन चाहत नाहीं।

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो,
उत्सव मोर न शनि तुहि भायो।

कहन लगे शनि मन सकुचाई,
का करिहों शिशु मोहि दिखाई।


नहिं विश्वास उमा उर भयउ,
शनि सों बालक देखन कह्‌यउ।

तड़तहिं शनि दृगकोण प्रकाशा,
बालक सिर उडि गयो अकाशा।

गिरिजा गिरी विकल ह्‌वै धरणी,
सो दुख दशा गयो नहिं वरणी।

हाहाकार मच्यो कैलाशा,
शनि कीन्हों लखि सुत का नाशा।

तुरत गरुड चढि विष्णु सिधाये,
काटि चक्र सो गजशिर लाये।

बालक के धड ऊपर धारयो,
प्राण मन्त्र पढि शंकर डारयो।

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हें,
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हें।

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा,
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा।

चले षडानन, भरमि भुलाई,
रचे बैठि तुम बुद्धि उपाई।

चरण मातु पितु के धर लीन्हें,
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें।

धनि गणेश कहि शिव हिय हर्ष्यो,
नभ ते सुरन सुमन बहुत वर्ष्यो।

तुम्हारी महिमा बुद्धि बढ ाई,
शेष सहस मुख सके न गाई।

मैं मति हीन मलीन दुखारी,
हरहुं कौन विधि विनय तुम्हारी।


भजत राम सुन्दर प्रभुदासा,
जग प्रयाग ककरा दुर्वासा।

अब प्रभु दया दीन पर कीजे,
अपनी भक्ति शक्ति कुछ दीजे।



दोहा

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै धर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहै जगत सनमान।
सम्बन्ध अपना सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगली मूर्ति गणेश।
गणपति जी की आरती 

ओम जय गौरीनन्‍दा,
हरि जय गिरिजानन्‍दा ।
गणपति आनन्‍दकन्‍दा,
गुरुगणपति आनन्‍दकन्‍दा ।
मैं चरणन वंदा।
ओम जय गौरीनन्‍दा।


सूंंड सूंडालो नेत्रविशालो कुण्‍डलझलकन्‍दा,
हरि कुण्‍डल झलकन्‍दा।
कुंकुम केशर चन्‍दन, कुंकुम केशर चन्‍दन,
सिंदुर वदन बिंदा।
ओम जय गौरीनन्‍दा।


मुकुट सुघड सोहंता मस्‍तक शोभन्‍ता,
हरि मस्‍तक शोभन्‍ता।
बहियां बाजूबन्‍दा हरि बहियां बाजूबन्‍दा,
पहुंची निरखन्‍ता।
ओम जय गौरीनन्‍दा।


रत्‍न जडित सिंहासन सोहत गणपति आनंदा,
हरि गणपति आनन्‍दा।
गले मोतियन की माला गले वैजयन्‍ती माला
सुरनर मुनि वृन्‍दा ।
ओम जय गौरीनन्‍दा।


मूषक वाहन राजत शिवसुत आनन्‍दा
हरि शिवसुत आनन्‍दा।
भजत शिवानन्‍द स्‍वामी जपत हरि हर स्‍वामी
मेटत भवफन्‍दा।
ओम जय गौरीनन्‍दा।
॥ श्रीगणेश्द्वादशनामस्तोत्रम् ॥


श्रीगणेशाय नमः ॥


शुक्लाम्बरधरं विश्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तयेः ॥ १॥


अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः ।
सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ २॥


गणानामधिपश्चण्डो गजवक्त्रस्त्रिलोचनः ।
प्रसन्नो भव मे नित्यं वरदातर्विनायक ॥ ३॥


सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकतो विघ्ननाशो विनायकः ॥ ४॥


धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि गणेशस्य तु यः पठेत् ॥ ५॥


विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थि विपुलं धनम् ।
इष्टकामं तु कामार्थी धर्मार्थी मोक्षमक्षयम् ॥ ६॥


विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
सङ्ग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥ ७॥


। इति मुद्गलपुराणोक्तं श्रीगणेशद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

Wednesday, February 10, 2021

॥ श्रीगणेशस्तोत्र ॥


श्रीगणेशाय नमः ।


नारद उवाच ।


प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥ १॥


प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २॥


लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ ३॥


नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४॥


द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरः प्रभुः ॥ ५॥


विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६॥


जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ७॥


अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८॥


॥ इति श्रीनारदपुराणे संकटनाशनं गणेशस्तोत्रं सम्पूर्ण
म् ॥