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Thursday, February 18, 2021

श्री शारदा (मैहर माता ) चालीसा 

॥ दोहा॥


मूर्ति स्वयंभू शारदा,
मैहर आन विराज ।

माला, पुस्तक, धारिणी,
वीणा कर में साज ॥

॥ चौपाई ॥
जय जय जय शारदा महारानी,
आदि शक्ति तुम जग कल्याणी।

रूप चतुर्भुज तुम्हरो माता,
तीन लोक महं तुम विख्याता॥

दो सहस्त्र वर्षहि अनुमाना,
प्रगट भई शारदा जग जाना ।

मैहर नगर विश्व विख्याता,
जहाँ बैठी शारदा जग माता॥

त्रिकूट पर्वत शारदा वासा,
मैहर नगरी परम प्रकाशा ।

सर्द इन्दु सम बदन तुम्हारो,
रूप चतुर्भुज अतिशय प्यारो॥

कोटि सुर्य सम तन द्युति पावन,
राज हंस तुम्हरो शचि वाहन।

कानन कुण्डल लोल सुहवहि,
उर्मणी भाल अनूप दिखावहिं ॥

वीणा पुस्तक अभय धारिणी,
जगत्मातु तुम जग विहारिणी।

ब्रह्म सुता अखंड अनूपा,
शारदा गुण गावत सुरभूपा॥

हरिहर करहिं शारदा वन्दन,
वरुण कुबेर करहिं अभिनन्दन ।

शारदा रूप कहण्डी अवतारा,
चण्ड-मुण्ड असुरन संहारा ॥

महिषा सुर वध कीन्हि भवानी,
दुर्गा बन शारदा कल्याणी।

धरा रूप शारदा भई चण्डी,
रक्त बीज काटा रण मुण्डी॥

तुलसी सुर्य आदि विद्वाना,
शारदा सुयश सदैव बखाना।

कालिदास भए अति विख्याता,
तुम्हरी दया शारदा माता॥

वाल्मीकी नारद मुनि देवा,
पुनि-पुनि करहिं शारदा सेवा।

चरण-शरण देवहु जग माया,
सब जग व्यापहिं शारदा माया॥

अणु-परमाणु शारदा वासा,
परम शक्तिमय परम प्रकाशा।

हे शारद तुम ब्रह्म स्वरूपा,
शिव विरंचि पूजहिं नर भूपा॥

ब्रह्म शक्ति नहि एकउ भेदा,
शारदा के गुण गावहिं वेदा।

जय जग वन्दनि विश्व स्वरूपा,
निर्गुण-सगुण शारदहिं रूपा॥

सुमिरहु शारदा नाम अखंडा,
व्यापइ नहिं कलिकाल प्रचण्डा।

सुर्य चन्द्र नभ मण्डल तारे,
शारदा कृपा चमकते सारे॥

उद्भव स्थिति प्रलय कारिणी,
बन्दउ शारदा जगत तारिणी।

दु:ख दरिद्र सब जाहिंन साई,
तुम्हारीकृपा शारदा माई॥

परम पुनीत जगत अधारा,मातु,
शारदा ज्ञान तुम्हारा।

विद्या बुद्धि मिलहिं सुखदानी,
जय जय जय शारदा भवानी॥

शारदे पूजन जो जन करहिं,
निश्चय ते भव सागर तरहीं।

शारद कृपा मिलहिं शुचि ज्ञाना,
होई सकल्विधि अति कल्याणा॥

जग के विषय महा दु:ख दाई,
भजहुँ शारदा अति सुख पाई।

परम प्रकाश शारदा तोरा,
दिव्य किरण देवहुँ मम ओरा॥

परमानन्द मगन मन होई,
मातु शारदा सुमिरई जोई।

चित्त शान्त होवहिं जप ध्याना,
भजहुँ शारदा होवहिं ज्ञाना॥

रचना रचित शारदा केरी,
पाठ करहिं भव छटई फेरी।

सत् – सत् नमन पढ़ीहे धरिध्याना,
शारदा मातु करहिं कल्याणा॥

शारदा महिमा को जग जाना,
नेति-नेति कह वेद बखाना।

सत् – सत् नमन शारदा तोरा,
कृपा द्र्ष्टि कीजै मम ओरा॥

जो जन सेवा करहिं तुम्हारी,
तिन कहँ कतहुँ नाहि दु:खभारी ।

जोयह पाठ करै चालीस,
मातु शारदा देहुँ आशीषा॥

॥ दोहा ॥

बन्दऊँ शारद चरण रज,
भक्ति ज्ञान मोहि देहुँ।
सकल अविद्या दूर कर,
सदा बसहु उर्गेहुँ।
जय-जय माई शारदा,
मैहर तेरौ धाम ।
शरण मातु मोहिं लिजिए,
तोहि भजहुँ निष्काम ॥


॥ इति श्री शारदा चालीसा ॥
श्री गायत्री आरती


जय गायत्री माता,
जयति जय गायत्री माता।

सत् मारग पर हमें चलाओ,
जो है सुखदाता॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

आदि शक्ति तुम अलख निरञ्जन
जग पालन कर्त्री।

दुःख, शोक, भय, क्लेश,
कलह दारिद्रय दैन्य हर्त्री॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

ब्रह्म रुपिणी, प्रणत पालिनी,
जगतधातृ अम्बे।

भवभयहारी, जनहितकारी,
सुखदा जगदम्बे॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

भयहारिणि भवतारिणि अनघे,
अज आनन्द राशी।

अविकारी, अघहरी, अविचलित,
अमले, अविनाशी॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

कामधेनु सत् चित् आनन्दा,
जय गंगा गीता।

सविता की शाश्वती शक्ति,
तुम सावित्री सीता॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

ऋग्, यजु, साम, अथर्व, प्रणयिनी,
प्रणव महामहिमे।

कुण्डलिनी सहस्त्रार, सुषुम्ना,
शोभा गुण गरिमे॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

स्वाहा, स्वधा,शची, ब्रह्माणी,
राधा, रुद्राणी।

जय सतरुपा, वाणी, विघा,
कमला, कल्याणी॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

जननी हम है, दीन, हीन,
दुःख, दरिद्र के घेरे।

यदपि कुटिल, कपटी कपूत,
तऊ बालक है तेरे॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

स्नेह सनी करुणामयी माता,
चरण शरण दीजै।

बिलख रहे हम शिशु सुत तेरे,
दया दृष्टि कीजै॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

काम, क्रोध, मद, लोभ, दम्भ,
दुर्भाव, द्वेष हरिये।

शुद्ध बुद्धि, निष्पाप हृदय,
मन को पवित्र करिये॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

तुम समर्थ सब भाँति तारिणी,
तुष्टि,पुष्टि त्राता।

सत् मारग पर हमें चलाओ,
जो है सुखदाता॥

॥ जयति जय गायत्री माता ॥

॥ इति श्री गायत्री आरती॥
श्री गायत्री चालीसा


॥ दोहा॥
ह्रीं, श्रीं क्लीं मेधा, प्रभा,
जीवन ज्योति प्रचण्ड।
शान्ति कान्ति , जागृति, प्रगति ,
रचना शक्ति अखण्ड॥


जगत जननी , मंगल करनि,
गायत्री सुखधाम।
प्रणवों सावित्री, स्वधा
स्वाहा पूरन काम॥


॥ चौपाई ॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी,
गायत्री नित कलिमल दहनी।
अक्षर चौबीस परम पुनीता,
इनमें बसें शास्त्र,
श्रुति गीता।


शाश्वत सतोगुणी सत रूपा,
सत्य सनातन सुधा अनूपा।
हंसारूढ श्वेताम्बर धारी,
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन-बिहारी।

पुस्तक , पुष्प,कमण्डलु, माला,
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला।

ध्यान धरत पुलकित हित होई,
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई।

कामधेनु तुम सुर तरु छाया,
निराकार की अद्भुत माया।

तुम्हरी शरण गहै जो कोई,
तरै सकल संकट सों सोई।

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली,
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली।

तुम्हरी महिमा पार न पावैं,
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥

चार वेद की मात पुनीता,
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता।

महामन्त्र जितने जग माहीं,
कोउ गायत्री सम नाहीं।

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै,
आलस पाप अविद्या नासै।

सृष्टि बीज जग जननि भवानी,
कालरात्रि वरदा कल्याणी।

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते,
तुम सों पावें सुरता तेते।

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे,
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे।

महिमा अपरम्पार तुम्हारी,
जय जय जय त्रिपदा भयहारी।

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना,
तुम सम अधिक न जगमे आना।

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा,
तुमहिं पाय कछु रहै न कलेशा।

जानत तुमहिं तुमहिं ह्वैजाई,
पारस परसि कुधातु सुहाई।


तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई,
माता तुम सब ठौर समाई।

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे,
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे।

सकल सृष्टि की प्राण विधाता,
पालक पोषक नाशक त्राता ।

मातेश्वरी दया व्रत धारी,
तुम सन तरे पातकी भारी।

जापर कृपा तुम्हारी होई,
तापर कृपा करें सब कोई।

मन्द बुद्धि ते बुधि बल पावें,
रोगी रोग रहित हो जावें।

दरिद्र मिटै कटै सब पीरा,
नाशै दुःख हरै भव भीरा।

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी,
नासै गायत्री भय हारी।

सन्तति हीन सुसन्तति पावें,
सुख संपति युत मोद मनावें।

भूत पिशाच सबै भय खावें,
यम के दूत निकट नहिं आवें।

जो सधवा सुमिरें चित लाई,
अछत सुहाग सदा सुखदाई।

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी,
विधवा रहें सत्य व्रत धारी।

जयति जयति जगदम्ब भवानी,
तुम सम ओर दयालु न दानी।

जो सतगुरु सो दीक्षा पावें,
सो साधन को सफल बनावें।

सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी,
लहै मनोरथ गृही विरागी।

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता,
सब समर्थ गायत्री माता।

ऋषि , मुनि , यती, तपस्वी, योगी,
आरत , अर्थी, चिन्तित , भोगी।

जो जो शरण तुम्हारी आवें,
सो सो मन वांछित फल पावें।

बल , बुद्धि, विद्या, शील स्वभाउ,
धन, वैभव, यश , तेज , उछाउ।

सकल बढें उपजें सुख नाना,
जे यह पाठ करै धरि ध्याना।

॥ दोहा ॥
यह चालीसा भक्ति युत,
पाठ करै जो कोई।

तापर कृपा, प्रसन्नता,
गायत्री की होय॥

॥ इति श्री गायत्री चालीसा ॥
श्री महालक्ष्मी गायत्री मंत्र

ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥

Om Shree Mahalakshmyai Cha Vidmahe Vishnu Patnyai Cha Dheemahi
Tanno Lakshmi Prachodayat Om॥

महालक्ष्मी धन, समृद्धि और भाग्य की देवी हैं। जीवन में सुख और सौभाग्य प्रधान करने वाली देवी भी कहा जाता है।

देवी लक्ष्मी हिंदू धर्म में सबसे अधिक पूजे जाने वाले देविओं में से एक हैं, माना जाता है कि यह धन, पद, महानता और प्रसिद्धि प्राप्त करने में मदद करती है।

देवी लक्ष्मी विष्णु जी की पत्नी है।



Lakshmi Beej Mantra
श्रीं
Shreem

Vyapar Vridhi Lakshmi Mantra
ॐ ऐं श्रीं महालक्ष्म्यै कमल धारिण्यै गरूड़ वाहिन्यै श्रीं ऐं नमः

Asht Lakshmi Mantra
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

गायत्री मंत्र


ॐ भूर् भुवः स्वः
तत् सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्




गायत्री मंत्र का अर्थ: " हम अपने प्रभु से बिनंती करते है, जो पूजनीय है,जो दुखों का नाश करने वाले है,जो सुख के भंडार है ,जो ज्ञान का भंडार है,अज्ञान को दूर करने वाला हैं-


जो कर्मो का उद्धार करने वाले है। ऐसे प्रभु से नीबेधन है वह हमें आत्म चिंतन करने की शक्ति दे ताकि हम सत्य पथ पर चले ।"


गायत्री मंत्र के हर शब्द का अर्थ - 

ॐ = प्रणव
भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाला
भुवः = दुख़ों का नाश करने वाला
स्वः = सुख़ प्रदाण करने वाला
तत = वह
सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल
वरेण- ्यं = सबसे उत्तम
भर्गो = कर्मों का उद्धार करने वाला
देवस्य = प्रभु
धीमहि = आत्म चिंतन के योग्य (ध्यान)
धियो = बुद्धि
यो = जो
नः = हमारी
प्रचो- दयात् = हमें शक्ति दें (प्रार्थना)