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Saturday, June 19, 2021

 श्री चन्द्र कवचम्


॥ ॐ गण गणपतये नमः ॥
अस्य श्रीचन्द्रकवचस्तोत्रमन्त्रस्य गौतम् ऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः, श्रीचन्द्रो देवता, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
समं चतुर्भुजं वन्दे केयूरमुकुटोज्ज्वलम् ।
वासुदेवस्य नयनं शङ्करस्य च भूषणम् ॥ १॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं शशिनः कवचं शुभम् ।
शशी पातु शिरोदेशं भालं पातु कलानिधिः ॥ २॥
चक्षुषी चन्द्रमाः पातु श्रुती पातु निशापतिः ।
प्राणं क्षपाकरः पातु मुखं कुमुदबान्धवः ॥ ३॥
पातु कण्ठं च मे सोमः स्कन्धे जैवातृकस्तथा ।
करौ सुधाकरः पातु वक्षः पातु निशाकरः ॥ ४॥
हृदयं पातु मे चन्द्रो नाभिं शङ्करभूषणः ।
मध्यं पातु सुरश्रेष्ठः कटिं पातु सुधाकरः ॥ ५॥
ऊरू तारापतिः पातु मृगाङ्को जानुनी सदा ।
अब्धिजः पातु मे जङ्घे पातु पादौ विधुः सदा ॥ ६॥
सर्वाण्यन्यानि चाङ्गानि पातु चन्द्वोऽखिलं वपुः ।
एतद्धि कवचं दिव्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७॥ 
॥ इति श्री चन्द्र कवचं सम्पूर्णम् ॥

Monday, February 22, 2021

श्री शिव महिमा अष्टकम ||

सुरवृन्दमुनीश्वरवन्द्यपदो हिमशैलविहारकरो रुचिरः ।
अनुरागनिधिर्मणिसर्पधरो जयतीह शिवः शिवरूपधरः ॥ १॥

भवतापविदग्धविपत्तिहरो भवमुक्तिकरो भवनामधरः ।
धृतचन्द्रशिरो विषपानकरो जयतीह शिवः शिवरूपधरः ॥ २॥

निजपार्षदवृन्दजयोच्चरितः करशूलधरोऽभयदानपरः ।
जटया परिभूषितदिव्यतमो जयतीह शिवः शिवरूपधरः ॥ ३॥

वृषभाङ्गविराजित उल्लसितः कृपया नितरामुपदेशकरः ।
त्वरितं फलदो गणयूथयुतो जयतीह शिवः शिवरूपधरः ॥ ४॥

अहिहारसुशोभित आप्तनुतो समुपास्यमहेश्वर आर्तिहरः ।
धृतविष्णुपदीसुजटो मुदितो जयतीह शिवः शिवरूपधरः ॥ ५॥

व्रजकृष्णपदाब्जपरागरतो व्रजकुञ्जसखीनवरूपधरः ।
व्रजगोपसुरेश उमाधिपतिर्जयतीह शिवः शिवरूपधरः ॥ ६॥

युगकेलिविलासमहारसिको रसतन्त्रपुराणकथाचतुरः ।
रसशास्त्ररसज्ञपटुर्मधुरो जयतीह शिवः शिवरूपधरः ॥ ७॥

यमपाशभयापहरोऽघहरः प्रबलोऽस्ति महाप्रबलः प्रखरः ।
परिपूर्णतमो हरिभक्तिभरो जयतीह शिवः शिवरूपधरः ॥ ८॥

शिवशान्त्यर्थदं दिव्यं श्रीशिवमहिमाष्टकम् ।
राधासर्वेश्वराख्येन शरणान्तेन निर्मितम् ॥

Wednesday, February 17, 2021


चन्द्र स्तोत्र || 


श्वेताम्बर: श्वेतवपु: किरीटी, श्वेतद्युतिर्दण्डधरो द्विबाहु: ।

चन्द्रो मृतात्मा वरद: शशांक:, श्रेयांसि मह्यं प्रददातु देव: ।।1।।


दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम ।

नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम ।।2।।


क्षीरसिन्धुसमुत्पन्नो रोहिणी सहित: प्रभु: ।

हरस्य मुकुटावास: बालचन्द्र नमोsस्तु ते ।।3।।


सुधायया यत्किरणा: पोषयन्त्योषधीवनम ।

सर्वान्नरसहेतुं तं नमामि सिन्धुनन्दनम ।।4।।


राकेशं तारकेशं च रोहिणीप्रियसुन्दरम ।

ध्यायतां सर्वदोषघ्नं नमामीन्दुं मुहुर्मुहु: ।।5।।

इति मन्त्रमहार्णवे चन्द्रमस: स्तोत्रम

Monday, February 15, 2021

श्री चंद्र देव आरती


ॐ जय सोम देवा, स्वामी जय सोम देवा।
दुःख हरता सुख करता, जय आनन्दकारी।


रजत सिंहासन राजत, ज्योति तेरी न्यारी।
दीन दयाल दयानिधि, भव बंधन हारी।

जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे।
सकल मनोरथ दायक, निर्गुण सुखराशि।


योगीजन हृदय में, तेरा ध्यान धरें।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, संत करें सेवा।


वेद पुराण बखानत, भय पातक हारी।
प्रेमभाव से पूजें, सब जग के नारी।


शरणागत प्रतिपालक, भक्तन हितकारी।
धन सम्पत्ति और वैभव, सहजे सो पावे।


विश्व चराचर पालक, ईश्वर अविनाशी।
सब जग के नर नारी, पूजा पाठ करें।

ॐ जय सोम देवा, स्वामी जय सोम देवा।

चन्द्र ग्रहण के वक़्त मंत्र पूजा और साधना -


1. चन्द्र ग्रहण वाले दिन मंत्र जाप में आप अपने गुरु, इष्ट देवता या राशि इष्ट देव का मंत्र जाप कर सकते हैं।

2. यदि आप चंद्र ग्रहण वाले दिन देवी श्री लक्ष्मी माँ जी की साधना करना चाहते हो तो बताये जा रहे चन्द्र ग्रहण मंत्र का जाप करें।
मंत्र : “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नम:” !

3. यदि आप इस चंद्र ग्रहण वाले दिन देवी श्री दुर्गा जी की साधना करना चाहते हो तो हमारे बताए अनुसार Chandra Grahan Mantra का जाप करें।
मंत्र : “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥ ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥” !


4. जिस भी जातक का कोई गुरु नहीं है तो वो Chandra Grahan Mantra के अनुसार भगवान् शिव जी का पंचाक्षरी
मंत्र : “नमः शिवाय” या भगवान् विष्णु जी का मंत्र : “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करना चाहिए।

5. यदि आप इस चंद्र ग्रहण में भगवान् श्री गणेश जी साधना करना चाहते हो तो हमारे द्वारा बताये जा रहे Chandra Grahan Mantra का जाप करें।
मंत्र : “ॐ गं गणपतये नमः” !

6. यदि आप इस चंद्र ग्रहण वाले दिन देवी श्री बाला सुंदरी जी की साधना करना चाहते हो तो बताये जा रहे चन्द्र ग्रहण मंत्र का जाप करें।
मंत्र : “ऐं क्लीं सौः” !

7. यदि आप इस चंद्र ग्रहण के दिन देवी श्री कामाख्या जी की साधना करना चाहते हो तो बताये जा रहे Chandra Grahan Mantra का जाप करें।
मंत्र : “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कामाख्यै स्वाहा” !

8. यदि आप चंद्र ग्रहण में भगवान श्री हनुमान जी की साधना करना चाहते हो तो बताये जा रहे चन्द्र ग्रहण मंत्र का जाप कीजिये।
मंत्र : “ॐ नमो भगवते हनुमते महा रुद्रात्मकाय हुं फट् स्वाहा” !

9. यदि आप चंद्र ग्रहण में देवी श्री महाकाली जी की साधना करना चाहते हो तो बताये जा रहे चन्द्र ग्रहण मंत्र का जाप करें।
मंत्र : “क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा” !

10. यदि आप इस चंद्र ग्रहण में देवी श्री बगलामुखी जी की साधना करना चाहते हो तो बताये जा रहे चन्द्र ग्रहण मंत्र का जाप करें।
मंत्र : “ॐ आं ह्ल्रीं क्रों हुं फट् स्वाहा” !

11. यदि इस चंद्र ग्रहण वाले दिन को आप देवी श्री गायत्री जी की साधना करना चाहते हो तो हमारे द्वारा बताये जा रहे Chandra Grahan Mantra का जाप करें।
मंत्र : “ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्” !
चन्द्र देव कवच -

श्रीचंद्रकवचस्तोत्रमंत्रस्य गौतम ऋषिः । अनुष्टुप् छंदः।
चंद्रो देवता । चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।

समं चतुर्भुजं वन्दे केयूरमुकुटोज्ज्वलम् ।
वासुदेवस्य नयनं शंकरस्य च भूषणम् ॥ १ ॥

एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं शशिनः कवचं शुभम् ।
शशी पातु शिरोदेशं भालं पातु कलानिधिः ॥ २ ॥

चक्षुषी चन्द्रमाः पातु श्रुती पातु निशापतिः ।
प्राणं क्षपाकरः पातु मुखं कुमुदबांधवः ॥ ३ ॥

पातु कण्ठं च मे सोमः स्कंधौ जैवा तृकस्तथा ।
करौ सुधाकरः पातु वक्षः पातु निशाकरः ॥ ४ ॥

हृदयं पातु मे चंद्रो नाभिं शंकरभूषणः ।
मध्यं पातु सुरश्रेष्ठः कटिं पातु सुधाकरः ॥ ५ ॥

ऊरू तारापतिः पातु मृगांको जानुनी सदा ।
अब्धिजः पातु मे जंघे पातु पादौ विधुः सदा ॥ ६ ॥

सर्वाण्यन्यानि चांगानि पातु चन्द्रोSखिलं वपुः ।
एतद्धि कवचं दिव्यं भुक्ति मुक्ति प्रदायकम् ॥
यः पठेच्छरुणुयाद्वापि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७ ॥


॥ इति श्रीब्रह्मयामले चंद्रकवचं संपूर्णम् ॥
चन्द्र अष्टोत्तर शतनामावली || 

ॐ श्रीमतॆ नमः ।
ॐ शशिधराय नमः ।
ॐ चंद्राय नमः ।
ॐ ताराधीशाय नमः ।
ॐ निशाकराय नमः ।
ॐ सुधानिधयॆ नमः ।
ॐ सदाराध्याय नमः ।
ॐ सत्पतयॆ नमः ।
ॐ साधुपूजिताय नमः ।
ॐ जितॆंद्रियाय नमः ॥ १० ॥


ॐ जयॊद्यॊगाय नमः ।
ॐ ज्यॊतिश्चक्रप्रवर्तकाय नमः ।
ॐ विकर्तनानुजाय नमः ।
ॐ वीराय नमः ।
ॐ विश्वॆशाय नमः ।
ॐ विदुषांपतयॆ नमः ।
ॐ दॊषाकराय नमः ।
ॐ दुष्टदूराय नमः ।
ॐ पुष्टिमतॆ नमः ।
ॐ शिष्टपालकाय नमः ॥ २० ॥


ॐ अष्टमूर्तिप्रियाय नमः ।
ॐ अनंताय नमः ।
ॐ अष्टदारुकुठारकाय नमः ।
ॐ स्वप्राकाशाय नमः ।
ॐ प्राकाशात्मनॆ नमः ।
ॐ द्युचराय नमः ।
ॐ दॆवभॊजनाय नमः ।
ॐ कळाधराय नमः ।
ॐ कालहॆतवॆ नमः ।
ॐ कामकृताय नमः ॥ ३० ॥


ॐ कामदायकाय नमः ।
ॐ मृत्युसंहारकाय नमः ।
ॐ अमर्त्याय नमः ।
ॐ नित्यानुष्ठानदाय नमः ।
ॐ क्षपाकराय नमः ।
ॐ क्षीणपापाय नमः ।
ॐ क्षयवृद्धिसमन्विताय नमः ।
ॐ जैवातृकाय नमः ।
ॐ शुचयॆ नमः ।
ॐ शुभ्राय नमः ॥ ४० ॥


ॐ जयिनॆ नमः ।
ॐ जयफलप्रदाय नमः ।
ॐ सुधामयाय नमः ।
ॐ सुरस्वामिनॆ नमः ।
ॐ भक्तानामिष्टदायकाय नमः ।
ॐ भुक्तिदाय नमः ।
ॐ मुक्तिदाय नमः ।
ॐ भद्राय नमः ।
ॐ भक्तदारिद्र्यभंजनाय नमः ।
ॐ सामगानप्रियाय नमः ॥ ५० ॥


ॐ सर्वरक्षकाय नमः ।
ॐ सागरॊद्भवाय नमः ।
ॐ भायांतकृतॆ नमः ।
ॐ भक्तिगम्याय नमः ।
ॐ भवबंधविमॊचनाय नमः ।
ॐ जगत्प्रकाशकिरणाय नमः ।
ॐ जगदानंदकारणाय नमः ।
ॐ निस्सपत्नाय नमः ।
ॐ निराहाराय नमः ।
ॐ निर्विकाराय नमः ॥ ६० ॥


ॐ निरामयाय नमः ।
ॐ भूच्छायाच्छादिताय नमः ।
ॐ भव्याय नमः ।
ॐ भुवनप्रतिपालकाय नमः ।
ॐ सकलार्तिहराय नमः ।


ॐ स्ॐयजनकाय नमः ।
ॐ साधुवंदिताय नमः ।
ॐ सर्वागमज्ञाय नमः ।
ॐ सर्वज्ञाय नमः ।
ॐ सनकादिमुनिस्तुताय नमः ॥ ७० ॥


ॐ सितच्छत्रध्वजॊपॆताय नमः ।
ॐ सितांगाय नमः ।
ॐ सितभूषणाय नमः ।
ॐ श्वॆतमाल्यांबरधराय नमः ।
ॐ श्वॆतगंधानुलॆपनाय नमः ।
ॐ दशाश्वरथसंरूढाय नमः ।
ॐ दंडपाणयॆ नमः ।
ॐ धनुर्धराय नमः ।
ॐ कुंदपुष्पॊज्वलाकाराय नमः ।
ॐ नयनाब्जसमुद्भवाय नमः ॥ ८० ॥


ॐ आत्रॆयगॊत्रजाय नमः ।
ॐ अत्यंतविनयाय नमः ।
ॐ प्रियदायकाय नमः ।
ॐ करुणारससंपूर्णाय नमः ।
ॐ कर्कटप्रभुवॆ नमः ।
ॐ अव्ययाय नमः ।
ॐ चतुरश्रासनारूढाय नमः ।


ॐ चतुराय नमः ।
ॐ दिव्यवाहनाय नमः ।
ॐ विवस्वन्मंडलाग्नॆयवासाय नमः ॥ ९० ॥
ॐ वसुसमृद्धिदाय नमः ।
ॐ महॆश्वरप्रियाय नमः ।
ॐ दांताय नमः ।
ॐ मॆरुगॊत्रप्रदक्षिणाय नमः ।


ॐ ग्रहमंडलमध्यस्थाय नमः ।
ॐ ग्रसितार्काय नमः ।
ॐ ग्रहाधिपाय नमः ।
ॐ द्विजराजाय नमः ।
ॐ द्युतिलकाय नमः ।
ॐ द्विभुजाय नमः ॥ १०० ॥


ॐ औदुंबरनागवासाय नमः ।
ॐ उदाराय नमः ।
ॐ रॊहिणीपतयॆ नमः ।
ॐ नित्यॊदयाय नमः ।
ॐ मुनिस्तुत्याय नमः ।
ॐ नित्यानंदफलप्रदाय नमः ।
ॐ सकलाह्लादनकराय नमः ।
ॐ पलाशसमिधप्रियाय नमः ॥ १०८ ॥


॥ इति श्री चंद्राष्टॊत्तर शतनामावळिः संपूर्णम्‌ ॥
चन्द्र ग्रह के मंत्र || 


चन्द्र वैदिक मंत्र || 
ऊँ इमं देवा असपत्नं ग्वं सुवध्यं । महते क्षत्राय महते ज्यैश्ठाय महते जानराज्यायेन्दस्येन्द्रियाय इमममुध्य पुत्रममुध्यै पुत्रमस्यै विश वोsमी राज: सोमोsस्माकं ब्राह्माणाना ग्वं राजा ।


चन्द्र तांत्रिक मंत्र ||
ऊँ ऎं क्लीं सोमाय नम: ।
ऊँ श्रां श्रीं श्रौं चन्द्रमसे नम: ।
ऊँ श्रीं श्रीं चन्द्रमसे नम: ।

चन्द्र एकाक्षरी बीज मंत्र || 
ऊँ सों सोमाय नम:

चन्द्र का पौराणिक मंत्र ||
ऊँ दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसंभवम । नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुटभूषणम ।।

चन्द्र गायत्री मंत्र || 
“ऊँ अमृतंग अन्गाये विधमहे कलारुपाय धीमहि, तन्नो सोम प्रचोदयात ” ।।
आरती श्री शिव जी की


जय शिव ओंकारा, हर शिव ओंकारा,
ब्रह्‌मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा।

एकानन चतुरानन पंचानन राजै
हंसानन गरुणासन वृषवाहन साजै।

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहै,
तीनों रूप निरखते त्रिभुवन मन मोहे।

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी,
चन्दन मृगमद चंदा सोहै त्रिपुरारी।

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे,
सनकादिक ब्रह्‌मादिक भूतादिक संगे।

कर मध्ये च कमंडलु चक्र त्रिशूलधारी,
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी।

ब्रह्‌मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका।

त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पत्ति पावे॥
श्री रुद्राष्टक

नमामी शमीशान निर्वाणरूपं।
विभुं व्यापकं ब्रह्‌म वेदस्वरूपं॥

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं।
चिदाकाशमाकाशवासं भजेsहं॥१॥

निराकामोंकारमूलं तुरीयं।
गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।।

करालं महाकाल कालं कृपालं।
गुणागार संसारपारं नतोsहं॥२॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं।
मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं॥

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा।
लसभ्दालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥ ३॥

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं।
प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं॥

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं।
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥४॥

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं।
अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥

त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं।
भजेsहं भवानीपतिं भावगम्यं॥५॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी।
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥

चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी।
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥६॥

न यावद्‌ उमानाथ पादारवन्दिं।
भजंतीह लोके परे वा नराणां॥

न तावत्सुखं शांति सन्तापनाशं।
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥७॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां।
नतोsहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥

जरा जन्म दुःखौद्य तातप्यमानं।
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥८॥

श्लोक -
रुद्राष्टकमिद्र प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शंम्भुः प्रसीदति॥९॥
श्री शिव चालीसा 

दोहा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

चौपाई

जय गिरिजापति दीनदयाला,
सदा करत सन्तन प्रतिपाला।
भाल चन्द्रमा सोहत नीके,
कानन कुण्डल नागफनी के॥

अंग गौर शिर गंग बहाये,
मुण्डमाल तन छार लगाये।
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे,
छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

मैना मातु कि हवे दुलारी,
वाम अंग सोहत छवि न्यारी।
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी,
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

नन्दि गणेश सोहैं तहं कैसे,
सागर मध्य कमल हैं जैसे।
कार्तिक श्याम और गणराऊ,
या छवि को कहि जात न काऊ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा,
तबहीं दुःख प्रभु आप निवारा।
किया उपद्रव तारक भारी,
देवन सब मिलि तुमहि जुहारी॥

तुरत षड़ानन आप पठायउ,
लव निमेष महं मारि गिरायउ।
आप जलंधर असुर संहारा,
सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई,
सबहिं कृपा कर लीन बचाई।
दानिन महं तुम सम कोई नाहीं,
सेवक अस्तुति करत सदा ही॥

वेद नाम महिमा तव गाई,
अकथ अनादि भेद नहिं पाई।
प्रगटी उदधि मंथन में ज्वाला,
जरे सुरासुर भये विहाला॥

कीन्हीं दया तहं करी सहाई,
नीलकण्ठ तब नाम कहाई।


पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा,
जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

सहस कमल में हो रहे धारी,
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखे जोई,
कमल नयन पूजन चहं सोई॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर,
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर।
जै जै जै अनन्त अविनासी,
करत कृपा सबही घटवासी॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै,
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै।
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो,
यहि अवसर मोहि आन उबारो॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो,
संकट से मोहि आन उबारो,
मातु पिता भ्राता सब कोई,
संकट में पूछत नहीं कोई॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी,
आय हरहुं मम संकट भारी।
धन निर्धन को देत सदा ही,
जो कोई जाचें वो फल पाहीं॥

अस्तुति केहि विधि करो तिहारी,
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी।
शंकर हो संकट के नाशन,
मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

योगि यति मुनि ध्यान लगावै,
नारद शारद शीश नवावै।
नमो नमो जय नमो शिवायै,
सुर ब्रह्‌मादिक पार न पाए॥

जो यह पाठ करे मन लाई,
तापर होत हैं शम्भु सहाई।
दुनिया में जो हो अधिकारी,
पाठ करे सो पावन हारी॥

पुत्रहीन इच्छा कर कोई,
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई।
पंडित त्रयोदशी को लावे,
ध्यान पूर्वक होम करावे॥

त्रयोदशी व्रत करे हमेशा,
तन नहिं ताके रहे कलेशा।
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे,
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥


जन्म जन्म के पाप नसावै,
अन्त वास शिवपुर में पावै।
कहै अयोध्या आस तुम्हारी,
जानि सकल दुख हरहु हमारी॥

दोहा

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौ चालीसा।
तु मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीशा॥
मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहिं, पूर्ण कीन कल्याण॥

Wednesday, February 10, 2021

 बाबा हरसू ब्रह्‌म चालीसा 


बाबा हरसू ब्रह्‌म के चरणों का करि ध्यान।
चालीसा प्रस्तुत करूं पावन यश गुण गान॥


हरसू ब्रह्‌म रूप अवतारी।
जेहि पूजत नित नर अरु नारी॥१॥


शिव अनवद्य अनामय रूपा।
जन मंगल हित शिला स्वरूपा॥ २॥


विश्व कष्ट तम नाशक जोई।
ब्रह्‌म धाम मंह राजत सोई ॥३॥


निर्गुण निराकार जग व्यापी।
प्रकट भये बन ब्रह्‌म प्रतापी॥४॥


अनुभव गम्य प्रकाश स्वरूपा।
सोइ शिव प्रकट ब्रह्‌म के रूपा॥५॥


जगत प्राण जग जीवन दाता।
हरसू ब्रह्‌म हुए विखयाता॥६॥


पालन हरण सृजन कर जोई।
ब्रह्‌म रूप धरि प्रकटेउ सोई॥७॥


मन बच अगम अगोचर स्वामी।
हरसू ब्रह्‌म सोई अन्तर्यामी॥८॥


भव जन्मा त्यागा सब भव रस।
शित निर्लेप अमान एक रस॥९॥


चैनपुर सुखधाम मनोहर।
जहां विराजत ब्रह्‌म निरन्तर॥१०॥


ब्रह्‌म तेज वर्धित तव क्षण-क्षण।
प्रमुदित होत निरन्तर जन-मन॥११॥


द्विज द्रोही नृप को तुम नासा।
आज मिटावत जन-मन त्रासा॥१२॥


दे संतान सृजन तुम करते।
कष्ट मिटाकर जन-भय हरते॥१३॥


सब भक्तन के पालक तुम हो।
दनुज वृत्ति कुल घालक तुम हो॥१४॥


कुष्ट रोग से पीड़ित होई।
आवे सभय शरण तकि सोई॥१५॥


भक्षण करे भभूत तुम्हारा।
चरण गहे नित बारहिं बारा॥१६॥


परम रूप सुन्दर सोई पावै।
जीवन भर तव यश नित गावै॥१७॥


पागल बन विचार जो खोवै।
देखत कबहुं हंसे फिर रोवै॥१८॥


तुम्हरे निकट आव जब सोई।
भूत पिशाच ग्रस्त उर होई॥१९॥


तुम्हरे धाम आई सुख माने।
करत विनय तुमको पहिचाने॥२०॥


तव दुर्धष तेज के आगे।
भूत-पिशाच विकल होई भागे॥२१॥


नाम जपत तव ध्यान लगावत।
भूत पिशाच निकट नहिं आवत॥२२॥


भांति-भांति के कष्ट अपारा।
करि उपचार मनुज जब हारा॥२३॥


हरसू ब्रह्‌म के धाम पधारे।
श्रमित-भ्रमित जन मन से हारे॥२४॥


तव चरणन परि पूजा करई।
नियत काल तक व्रत अनुसरई॥२५॥


श्रद्धा अरू विश्वास बटोरी।
बांधे तुमहि प्रेम की डोरी॥२६॥


कृपा करहुं तेहि पर करुणाकर।
कष्ट मिटे लौटे प्रमुदित घर॥२७॥


वर्ष-वर्ष तव दर्शन करहीं।
भक्ति भाव श्रद्धा उर भरहीं॥२८॥


तुम व्यापक सबके उर अंतर।
जानहुं भाव कुभाव निरन्तर॥२९॥


मिटे कष्ट नर अति सुख पावे।
जब तुमको उन मध्य बिठावे॥३०॥


करत ध्यान अभ्यास निरन्तर।
तब होइहहिं प्रकाश उर अंतर॥३१॥


देखिहहिं शुद्ध स्वरूप तुम्हारा।
अनुभव गम्य विवेक सहारा॥३२॥


सदा एक-रस जीवन भोगी।
ब्रह्‌म रूप तब होइहहिं योगी॥३३॥


यज्ञ-स्थल तव धाम शुभ्रतर।
हवन-यज्ञ जहं होत निरंतर॥३४॥


सिद्धासन बैठे योगी जन।
ध्यान मग्न अविचल अन्तर्मन॥३५॥


अनुभव करहिं प्रकाश तुम्हारा।
होकर द्वैत भाव से न्यारा॥३६॥


पाठ करत बहुधा सकाम नर।
पूर्ण होत अभिलाष शीघ्रतर॥३७॥


नर-नारी गण युग कर जोरे।
विनवत चरण परत प्रभु तोरे॥३८॥


भूत पिशाच प्रकट होई बोले।
गुप्त रहस्य शीघ्र ही खोले॥३९॥


ब्रह्‌म तेज तव सहा न जाई।
छोड़ देह तब चले पराई॥४०॥


पूर्ण काम हरसू सदा, पूरण कर सब काम।
परम तेज मय बसहुं तुम, भक्तन के उर धाम॥