Saturday, June 26, 2021

 मां धूमावती अष्टक स्तोत्रं


।।अथ स्तोत्रं।।
प्रातर्या स्यात्कुमारी कुसुमकलिकया जापमाला जपन्ती,
मध्याह्ने प्रौढरूपा विकसितवदना चारुनेत्रा निशायाम्।
सन्ध्यायां वृद्धरूपा गलितकुचयुगा मुण्डमालां,
वहन्ती सा देवी देवदेवी त्रिभुवनजननी कालिका पातु युष्मान्।।१।।
बद्ध्वा खट्वाङ्गकोटौ कपिलवरजटामण्डलम्पद्मयोने:,
कृत्वा दैत्योत्तमाङ्गैस्स्रजमुरसि शिर शेखरन्तार्क्ष्यपक्षै:।
पूर्णं रक्तै्सुराणां यममहिषमहाशृङ्गमादाय पाणौ,
पायाद्वो वन्द्यमानप्रलयमुदितया भैरव: कालरात्र्याम्।।२।।
चर्वन्तीमस्थिखण्डम्प्रकटकटकटाशब्दशङ्घातम्,
उग्रङ्कुर्वाणा प्रेतमध्ये कहहकहकहाहास्यमुग्रङ्कृशाङ्गी।
नित्यन्नित्यप्रसक्ता डमरुडिमडिमां स्फारयन्ती मुखाब्जम्,
पायान्नश्चण्डिकेयं झझमझमझमा जल्पमाना भ्रमन्ती।।३।।
टण्टण्टण्टण्टटण्टाप्रकरटमटमानाटघण्टां वहन्ती,
स्फेंस्फेंस्फेंस्कारकाराटकटकितहसा नादसङ्घट्टभीमा।
लोलम्मुण्डाग्रमाला ललहलहलहालोललोलाग्रवाचञ्चर्वन्ती,
चण्डमुण्डं मटमटमटिते चर्वयन्ती पुनातु।।४।।
वामे कर्णे मृगाङ्कप्रलयपरिगतन्दक्षिणे सूर्यबिम्बङ्कण्ठे,
नक्षत्रहारंव्वरविकटजटाजूटके मुण्डमालाम्।
स्कन्धे कृत्वोरगेन्द्रध्वजनिकरयुतम्ब्रह्मकङ्कालभारं,
संहारे धारयन्ती मम हरतु भयम्भद्रदा भद्रकाली।।५।।
तैलाभ्यक्तैकवेणी त्रपुमयविलसत्कर्णिकाक्रान्तकर्णा,
लौहेनैकेन कृत्वा चरणनलिनकामात्मन: पादशोभाम्।
दिग्वासा रासभेन ग्रसति जगदिदंय्या यवाकर्णपूरा,
वर्षिण्यातिप्रबद्धा ध्वजविततभुजा सासि देवि त्वमेव।।६।।
सङ्ग्रामे हेतिकृत्वैस्सरुधिरदशनैर्यद्भटानां,
शिरोभिर्मालामावद्ध्य मूर्ध्नि ध्वजविततभुजा त्वं श्मशाने प्रविष्टा।
दृष्टा भूतप्रभूतैः पृथुतरजघना वद्धनागेन्द्रकाञ्ची,
शूलग्रव्यग्रहस्ता मधुरुधिरसदा ताम्रनेत्रा निशायाम्।।७।।
दंष्ट्रा रौद्रे मुखेऽस्मिंस्तव विशति जगद्देवि सर्वं क्षणार्द्धात्,
संसारस्यान्तकाले नररुधिरवशा सम्प्लवे भूमधूम्रे।
काली कापालिकी साशवशयनतरा योगिनी योगमुद्रा रक्तारुद्धिः,
सभास्था भरणभयहरा त्वं शिवा चण्डघण्टा।।८।।
धूमावत्यष्टकम्पुण्यं सर्वापद्विनिवारकम्,
य: पठेत्साधको भक्त्या सिद्धिं व्विन्दन्ति वाञ्छिताम्।।९।।
महापदि महाघोरे महारोगे महारणे,
शत्रूच्चाटे मारणादौ जन्तूनाम्मोहने तथा।।१०।।
पठेत्स्तोत्रमिदन्देवि सर्वत्र सिद्धिभाग्भवेत्,
देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगा:।।११।।
सिंहव्याघ्रादिकास्सर्वे स्तोत्रस्मरणमात्रत:,
दूराद्दूरतरं य्यान्ति किम्पुनर्मानुषादय:।।१२।।
स्तोत्रेणानेन देवेशि किन्न सिद्ध्यति भूतले,
सर्वशान्तिर्ब्भवेद्देवि ह्यन्ते निर्वाणतां व्व्रजेत्।।१३।।
।।इत्यूर्द्ध्वाम्नाये धूमावतीअष्टक स्तोत्रं समाप्तम्।।

Saturday, June 19, 2021

 श्री चन्द्र कवचम्


॥ ॐ गण गणपतये नमः ॥
अस्य श्रीचन्द्रकवचस्तोत्रमन्त्रस्य गौतम् ऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः, श्रीचन्द्रो देवता, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
समं चतुर्भुजं वन्दे केयूरमुकुटोज्ज्वलम् ।
वासुदेवस्य नयनं शङ्करस्य च भूषणम् ॥ १॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं शशिनः कवचं शुभम् ।
शशी पातु शिरोदेशं भालं पातु कलानिधिः ॥ २॥
चक्षुषी चन्द्रमाः पातु श्रुती पातु निशापतिः ।
प्राणं क्षपाकरः पातु मुखं कुमुदबान्धवः ॥ ३॥
पातु कण्ठं च मे सोमः स्कन्धे जैवातृकस्तथा ।
करौ सुधाकरः पातु वक्षः पातु निशाकरः ॥ ४॥
हृदयं पातु मे चन्द्रो नाभिं शङ्करभूषणः ।
मध्यं पातु सुरश्रेष्ठः कटिं पातु सुधाकरः ॥ ५॥
ऊरू तारापतिः पातु मृगाङ्को जानुनी सदा ।
अब्धिजः पातु मे जङ्घे पातु पादौ विधुः सदा ॥ ६॥
सर्वाण्यन्यानि चाङ्गानि पातु चन्द्वोऽखिलं वपुः ।
एतद्धि कवचं दिव्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७॥ 
॥ इति श्री चन्द्र कवचं सम्पूर्णम् ॥
 श्री चामुण्डा देवी चालीसा 


॥ दोहा ॥
नीलवरण मा कालिका रहती सदा प्रचंड ।
दस हाथो मई ससत्रा धार देती दुस्त को दांड्ड़ ॥
मधु केटभ संहार कर करी धर्म की जीत ।
मेरी भी बढ़ा हरो हो जो कर्म पुनीत ॥

॥ चौपाई ॥
नमस्कार चामुंडा माता । तीनो लोक मई मई विख्याता ॥
हिमाल्या मई पवितरा धाम है । महाशक्ति तुमको प्रडम है ॥१॥
मार्कंडिए ऋषि ने धीयया । कैसे प्रगती भेद बताया ॥
सूभ निसुभ दो डेतिए बलसाली । तीनो लोक जो कर दिए खाली ॥२॥
वायु अग्नि याँ कुबेर संग । सूर्या चंद्रा वरुण हुए तंग ॥
अपमानित चर्नो मई आए । गिरिराज हिमआलये को लाए ॥३॥
भद्रा-रॉंद्र्रा निट्टया धीयया । चेतन शक्ति करके बुलाया ॥
क्रोधित होकर काली आई । जिसने अपनी लीला दिखाई ॥४॥
चंदड़ मूंदड़ ओर सुंभ पतए । कामुक वेरी लड़ने आए ॥
पहले सुग्गृीव दूत को मारा । भगा चंदड़ भी मारा मारा ॥५॥
अरबो सैनिक लेकर आया । द्रहूँ लॉकंगन क्रोध दिखाया ॥
जैसे ही दुस्त ललकारा । हा उ सबद्ड गुंजा के मारा ॥६॥
सेना ने मचाई भगदड़ । फादा सिंग ने आया जो बाद ॥
हत्टिया करने चंदड़-मूंदड़ आए । मदिरा पीकेर के घुर्रई ॥७॥
चतुरंगी सेना संग लाए । उचे उचे सीविएर गिराई ॥
तुमने क्रोधित रूप निकाला । प्रगती डाल गले मूंद माला ॥८॥
चर्म की सॅडी चीते वाली । हड्डी ढ़ाचा था बलसाली ॥
विकराल मुखी आँखे दिखलाई । जिसे देख सृिस्टी घबराई ॥९॥
चंदड़ मूंदड़ ने चकरा चलाया । ले तलवार हू साबद गूंजाया ॥
पपियो का कर दिया निस्तरा । चंदड़ मूंदड़ दोनो को मारा ॥१०॥
हाथ मई मस्तक ले मुस्काई । पापी सेना फिर घबराई ॥
सरस्वती मा तुम्हे पुकारा । पड़ा चामुंडा नाम तिहरा ॥११॥
चंदड़ मूंदड़ की मिरतट्यु सुनकर । कालक मौर्या आए रात पर ॥
अरब खराब युध के पाठ पर । झोक दिए सब चामुंडा पर ॥१२॥
उगर्र चंडिका प्रगती आकर । गीडदीयो की वाडी भरकर ॥
काली ख़टवांग घुसो से मारा । ब्रह्माड्ड ने फेकि जल धारा ॥१३॥
माहेश्वरी ने त्रिशूल चलाया । मा वेश्दवी कक्करा घुमाया ॥
कार्तिके के शक्ति आई । नार्सिंघई दित्तियो पे छाई ॥१४॥
चुन चुन सिंग सभी को खाया । हर दानव घायल घबराया ॥
रक्टतबीज माया फेलाई । शक्ति उसने नई दिखाई ॥१५॥
रक्त्त गिरा जब धरती उपर । नया डेतिए प्रगता था वही पर ॥
चाँदी मा अब शूल घुमाया । मारा उसको लहू चूसाया ॥१६॥
सूभ निसुभ अब डोडे आए । सततर सेना भरकर लाए ॥
वाज्ररपात संग सूल चलाया । सभी देवता कुछ घबराई ॥१७॥
ललकारा फिर घुसा मारा । ले त्रिसूल किया निस्तरा ॥
सूभ निसुभ धरती पर सोए । डेतिए सभी देखकर रोए ॥१८॥
कहमुंडा मा ध्ृम बचाया । अपना सूभ मंदिर बनवाया ॥
सभी देवता आके मानते । हनुमत भेराव चवर दुलते ॥१९॥
आसवीं चेट नवराततरे अओ । धवजा नारियल भेट चाड़ौ ॥
वांडर नदी सनन करऔ । चामुंडा मा तुमको पियौ ॥२०॥


॥ दोहा ॥
सरणागत को शक्ति दो हे जाग की आधार ।
‘ओम’ ये नेया दोलती कर दो भाव से पार ॥ 
॥ इति चामुण्डा देवी चालीसा सम्पूर्णम ॥
 अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं || 
अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं || 


कौन कहता है भगवान आते नहीं, तुम मीरा के जैसे बुलाते नहीं |
अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं ||


कौन कहता है भगवान खाते नहीं, बेर शबरी के जैसे खिलते नहीं |
अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं ||


कौन कहता है भगवान सोते नहीं, माँ यशोदा के जैसे सुलाते नहीं |
अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं ||


कौन कहता है भगवान नाचते नहीं, तुम गोपी के जैसे नचाते नहीं |
अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं ||


अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं ||
 जैसे सूरज की गर्मी से जलते
जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
मिल जाये तरुवर की छाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है,
मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम
सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
मिल जाये तरुवर की छाया
भटका हुआ मेरा मन था कोई
मिल ना रहा था सहारा
लहरों से लडती हुई नाव को जैसे,
मिल ना रहा हो किनारा
उस लडखडाती हुई नाव को जो
किसी ने किनारा दिखाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है,
मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम
सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
मिल जाये तरुवर की छाया
शीतल बने आग चन्दन के जैसी
राघव कृपा हो जो तेरी
उजयाली पूनम की हो जाये राते
जो थी अमावस अँधेरी
युग युग से प्यासी मुरुभूमि ने
जैसे सावन का संदेस पाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है,
मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम
सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
मिल जाये तरुवर की छाया
जिस राह की मंजिल तेरा मिलन हो
उस पर कदम मैं बढ़ाऊं
फूलों मे खारों मे, पतझड़ बहारो मे
मैं ना कभी डगमगाऊँ
पानी के प्यासे को तकदीर ने
जैसे जी भर के अमृत पिलाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है,
मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम
सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
मिल जाये तरुवर की छाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है,
मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम
 श्री बटुक भैरव कवचम्


महादेव उवाच
प्रीयतां भैरवोदेव नमो वै भैरवाय च।
देवेशि देहरक्षार्थ कारणं कथ्यतां ध्रुवम्।।
मियन्ते साधका येन विना श्मशानभूमिषु।
रणेषु चातिघोरेषु महामृत्यु भयेषु च।।
श्रृंगी सलिलवज्रेषु ज्वरादिव्याधि यह्निषु ।।


देव्युवाच -
कथयामि श्रृणु प्राज्ञ बटुककवचं शुभम्।
गोपनीयं प्रयत्नेन मातृकाजारजो यथा।।
ॐ अस्य श्री बटुकभैरवकवचस्य आनन्द भैरव ऋषि: त्रिष्टुप्छंद: श्री बटुकभैरवो देवता बंवीजं ह्रीं शक्ति: ॐ बटुकायेति कीलकं ममाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
ॐ सहस्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः।
पातु मां बटुकोदेवो भैरवः सर्वकर्मसु।।
पूर्वस्यां असितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा ।
चाग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरव: । ।
नैऋत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे।
वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः।।
भीषणो भैरवः पातु उत्तरस्यां तु सर्वदा ।
संहार भैरवः पायात् ईशान्यां च महेश्वरः ।।
ऊर्ध्व पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः।
सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः।।
वामदेयो बनान्ते च बने घोररतथाऽवतु।
जले तत्पुरुषा पातु स्थले ईशान एव च।।
डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् मे सर्वतः प्रभुः।
हाकिनी पुत्रकः पातु दारांस्तु लाकिनी सुतः।।
पातु शाकिनिकापुत्रः सैन्यं मे कालभैरवः ।
मालिनी पुत्रकःपातु पशूनश्यान् गजांस्तथा ।।
महाकालोऽक्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा।
वाद्यं बाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा।।
एतद् कवचमीशान तव स्नेहात्प्रकाशितम्।
नाख्येयं नरलोकेषु सारभूतं सुरप्रियम्।।
यस्मै कस्मै न दातव्यं कवचं सुरदुर्लभम्।
न देयं पर शिष्येभ्यः कृपणेभ्यश्च शंकर।।
यो ददाति निषिद्धेभ्यः सर्वभ्रप्ो भवेत्किल।
अनेन कवचेनैव रक्षां कृत्वा विचक्षणः।।
विरचरन्त्यत्र कुत्रापि न विघ्नैः परिभूयते।
मन्त्रेण रक्षिते योगी कवचं रक्षकं यतः।।
तरमात्सर्व प्रयत्नेन दुर्लभं पाप चेतसाम् ।
भुर्जे रंभात्वचि वापि लिखित्वा विधिवत्प्भो। ।
कुंकुमेनाप्टगन्धेन गोरोचनैश्च केशरैः।
धारयेत्पाठयेद्धपि संपठेद्वापि नित्यशः।।
सम्प्राप्नोति फलं सर्वं नात्र कार्या विचारणा।
सततं पठ्यते यत्र तत्र भैरव संस्थितिः।।
न शक्नोमि प्रभावं वै कवचस्यास्यवर्णितुम्।
नमो भैरवदेवाय सर्वभूताय वै नमः।।
नमसैलोक्य नाथाय नाथनाथाय वै नमः ।।
।। इति बटुक भैरव तन्त्रोक्तं भैरवकवचम् ।।
 तांत्रोक्त भैरव कवच 




 
ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः |
पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु ||
पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा |
आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः ||
नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे |
वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः ||
भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा |
संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः ||
ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः |
सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः ||
रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु |
जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च ||
डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः |
हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः ||
पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः |
मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा ||
महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा |
वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा |
 श्री भैरव स्तुति || 



ॐ जै-जै भैरवबाबा स्वामी जै भैरवबाबा।
नमो विश्व भूतेश भुजंगी मंजुल कहलावा
उमानंद अमरेश विमोचन जनपद सिरनावा।
काशी के कृतवाल आपको सकल जगत ध्यावा।
स्वान सवारी बटुकनाथ प्रभु पी मद हर्षावा। ॐ।।
रवि के दिन जग भोग लगावे मोदक मन भावा।
भीषण भीम कृपालु त्रिलोचन खप्पर भर खावा।
शेखरचंद्र कृपालु शशि प्रभु मस्तक चमकावा।
गल मुण्डन की माला सुशोभित सुन्दर दरसावा। ॐ।।
नमो-नमो आनंद कंद प्रभु लट गत मठ झावा।
कर्ष तुण्ड शिव कपिल त्रयम्बक यश जग में छावा।
जो जन तुमसे लगावत संकट नहिं पावा।
छीतरमल जब शरण तुम्हारी आरती प्रभु गावा।
ॐ जै-जै भैरवबाबा स्वामी जै भैरवबाबा।
 श्री भैरव तांण्डव स्तोत्र


।। अथ भैरव तांण्डव स्तोत्र ।।
ॐ चण्डं प्रतिचण्डं करधृतदण्डं कृतरिपुखण्डं सौख्यकरम् ।
लोकं सुखयन्तं विलसितवन्तं प्रकटितदन्तं नृत्यकरम् ।। 
डमरुध्वनिशंखं तरलवतंसं मधुरहसन्तं लोकभरम् । 
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ।।
चर्चित सिन्दूरं रणभूविदूरं दुष्टविदूरं श्रीनिकरम् ।
किँकिणिगणरावं त्रिभुवनपावं खर्प्परसावं पुण्यभरम् ।।
करुणामयवेशं सकलसुरेशं मुक्तशुकेशं पापहरम् । 
भज भज भूतेशं प्रकट महेशं श्री भैरववेषं कष्टहरम् ।।
कलिमल संहारं मदनविहारं फणिपतिहारं शीध्रकरम् ।
कलुषंशमयन्तं परिभृतसन्तं मत्तदृगृन्तं शुद्धतरम् ।।
गतिनिन्दितहेशं नरतनदेशं स्वच्छकशं सन्मुण्डकरम् ।
भज भज भूतेशं प्रकट महेशं श्रीभैरववेशं कष्टहरम् ।।
कठिन स्तनकुंभं सुकृत सुलभं कालीडिँभं खड्गधरम् ।
वृतभूतपिशाचं स्फुटमृदुवाचं स्निग्धसुकाचं भक्तभरम् ।।
तनुभाजितशेषं विलमसुदेशं कष्टसुरेशं प्रीतिनरम् ।
भज भज भूतेशं प्रकट महेशं श्रीभैरववेशं कष्टहरम् ।।
ललिताननचंद्रं सुमनवितन्द्रं बोधितमन्द्रं श्रेष्ठवरम् ।
सुखिताखिललोकं परिगतशोकं शुद्धविलोकं पुष्टिकरम् ।।
वरदाभयहारं तरलिततारं क्ष्युद्रविदारं तुष्टिकरम् ।
भज भज भूतेशं प्रकट महेशं श्रीभैरववेषं कष्टहरम् ।।
सकलायुधभारं विजनविहारं सुश्रविशारं भृष्टमलम् ।
शरणागतपालं मृगमदभालं संजितकालं स्वेष्टबलम् ।।
पदनूपूरसिंजं त्रिनयनकंजं गुणिजनरंजन कुष्टहरम् ।
भज भज भूतेशं प्रकट महेशं श्री भैरव वेषं कष्टहरम् ।।
मदयिँतुसरावं प्रकटितभावं विश्वसुभावं ज्ञानपदम् ।
रक्तांशुकजोषं परिकृततोषं नाशितदोषं सन्मंतिदमम् ।।
कुटिलभ्रकुटीकं ज्वरधननीकं विसरंधीकं प्रेमभरम् ।
भज भज भूतेशं प्रकट महेशं श्रीभैरववेषं कष्टहरम् ।।
परिर्निजतकामं विलसितवामं योगिजनाभं योगेशम् ।
बहुमधपनाथं गीतसुगाथं कष्टसुनाथं वीरेशम् । 
कलयं तमशेषं भृतजनदेशं नृत्य सुरेशं वीरेशम् ।
भज भज भूतेशं प्रकट महेशं श्रीभैरववेषं कष्टहरम् ।। 
ॐ।। श्री भैरव तांण्डव स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ।।ॐ 
 श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्रम्


।। श्री मार्कण्डेय उवाच ।।
भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम !
पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः ।।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं ।
तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् ।।
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर !।।
।। श्री नन्दिकेश्वर उवाच ।।
इदं ब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक !
स्तोत्रं वटुक-नाथस्य, दुर्लभं भुवन-त्रये ।।
सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् ।
दारिद्र्य-शमनं पुंसामापदा-भय-हारकम् ।।
अष्टैश्वर्य-प्रदं नृणां, पराजय-विनाशनम् ।
महा-कान्ति-प्रदं चैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् ।।
महा-कीर्ति-प्रदं स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः ।
न वक्तव्यं निराचारे, हि पुत्राय च सर्वथा ।।
शुचये गुरु-भक्ताय, शुचयेऽपि तपस्विने ।
महा-भैरव-भक्ताय, सेविते निर्धनाय च ।।
निज-भक्ताय वक्तव्यमन्यथा शापमाप्नुयात् ।
स्तोत्रमेतत् भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः ।।
श्रृणुष्व ब्रूहितो ब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् ।।
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-स्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-देवता, ह्रीं बीजं, क्लीं शक्ति, सः कीलकम्, मम-सर्व-काम-सिद्धयर्थे पाठे विनियोगः ।
ध्यानः-
मन्दार-द्रुम-मूल-भाजि विजिते रत्नासने संस्थिते ।
दिव्यं चारुण-चञ्चुकाधर-रुचा देव्या कृतालिंगनः ।।
भक्तेभ्यः कर-रत्न-पात्र-भरितं स्वर्ण दधानो भृशम् ।
स्वर्णाकर्षण-भैरवो भवतु मे स्वर्गापवर्ग-प्रदः ।।
।। स्तोत्र-पाठ ।।
ॐ नमस्तेऽस्तु भैरवाय, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मने,
नमः त्रैलोक्य-वन्द्याय, वरदाय परात्मने ।।
रत्न-सिंहासनस्थाय, दिव्याभरण-शोभिने ।
नमस्तेऽनेक-हस्ताय, ह्यनेक-शिरसे नमः ।
नमस्तेऽनेक-नेत्राय, ह्यनेक-विभवे नमः ।।
नमस्तेऽनेक-कण्ठाय, ह्यनेकान्ताय ते नमः ।
नमोस्त्वनेकैश्वर्याय, ह्यनेक-दिव्य-तेजसे ।।
अनेकायुध-युक्ताय, ह्यनेक-सुर-सेविने ।
अनेक-गुण-युक्ताय, महा-देवाय ते नमः ।।
नमो दारिद्रय-कालाय, महा-सम्पत्-प्रदायिने ।
श्रीभैरवी-प्रयुक्ताय, त्रिलोकेशाय ते नमः ।।
दिगम्बर ! नमस्तुभ्यं, दिगीशाय नमो नमः ।
नमोऽस्तु दैत्य-कालाय, पाप-कालाय ते नमः ।।
सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं, नमस्ते दिव्य-चक्षुषे ।
अजिताय नमस्तुभ्यं, जितामित्राय ते नमः ।।
नमस्ते रुद्र-पुत्राय, गण-नाथाय ते नमः ।
नमस्ते वीर-वीराय, महा-वीराय ते नमः ।।
नमोऽस्त्वनन्त-वीर्याय, महा-घोराय ते नमः ।
नमस्ते घोर-घोराय, विश्व-घोराय ते नमः ।।
नमः उग्राय शान्ताय, भक्तेभ्यः शान्ति-दायिने ।
गुरवे सर्व-लोकानां, नमः प्रणव-रुपिणे ।।
नमस्ते वाग्-भवाख्याय, दीर्घ-कामाय ते नमः ।
नमस्ते काम-राजाय, योषित्कामाय ते नमः ।।
दीर्घ-माया-स्वरुपाय, महा-माया-पते नमः ।
सृष्टि-माया-स्वरुपाय, विसर्गाय सम्यायिने ।।
रुद्र-लोकेश-पूज्याय, ह्यापदुद्धारणाय च ।
नमोऽजामल-बद्धाय, सुवर्णाकर्षणाय ते ।।
नमो नमो भैरवाय, महा-दारिद्रय-नाशिने ।
उन्मूलन-कर्मठाय, ह्यलक्ष्म्या सर्वदा नमः ।।
नमो लोक-त्रेशाय, स्वानन्द-निहिताय ते ।
नमः श्रीबीज-रुपाय, सर्व-काम-प्रदायिने ।।
नमो महा-भैरवाय, श्रीरुपाय नमो नमः ।
धनाध्यक्ष ! नमस्तुभ्यं, शरण्याय नमो नमः ।।
नमः प्रसन्न-रुपाय, ह्यादि-देवाय ते नमः ।
नमस्ते मन्त्र-रुपाय, नमस्ते रत्न-रुपिणे ।।
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, सुवर्णाय नमो नमः ।
नमः सुवर्ण-वर्णा य, महा-पुण्याय ते नमः ।।
नमः शुद्धाय बुद्धाय, नमः संसार-तारिणे ।
नमो देवाय गुह्याय, प्रबलाय नमो नमः ।।
नमस्ते बल-रुपाय, परेषां बल-नाशिने ।
नमस्ते स्वर्ग-संस्थाय, नमो भूर्लोक-वासिने ।।
नमः पाताल-वासाय, निराधाराय ते नमः ।
नमो नमः स्वतन्त्राय, ह्यनन्ताय नमो नमः ।।
द्वि-भुजाय नमस्तुभ्यं, भुज-त्रय-सुशोभिने ।
नमोऽणिमादि-सिद्धाय, स्वर्ण-हस्ताय ते नमः ।।
पूर्ण-चन्द्र-प्रतीकाश-वदनाम्भोज-शोभिने ।
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, स्वर्णालंकार-शोभिने ।।
नमः स्वर्णाकर्षणाय, स्वर्णाभाय च ते नमः ।
नमस्ते स्वर्ण-कण्ठाय, स्वर्णालंकार-धारिणे ।।
स्वर्ण-सिंहासनस्थाय, स्वर्ण-पादाय ते नमः ।
नमः स्वर्णाभ-पाराय, स्वर्ण-काञ्ची-सुशोभिने ।।
नमस्ते स्वर्ण-जंघाय, भक्त-काम-दुघात्मने ।
नमस्ते स्वर्ण-भक्तानां, कल्प-वृक्ष-स्वरुपिणे ।।
चिन्तामणि-स्वरुपाय, नमो ब्रह्मादि-सेविने ।
कल्पद्रुमाधः-संस्थाय, बहु-स्वर्ण-प्रदायिने ।।
भय-कालाय भक्तेभ्यः, सर्वाभीष्ट-प्रदायिने ।
नमो हेमादि-कर्षाय, भैरवाय नमो नमः ।।
स्तवेनानेन सन्तुष्टो, भव लोकेश-भैरव !
पश्य मां करुणाविष्ट, शरणागत-वत्सल !
श्रीभैरव धनाध्यक्ष, शरणं त्वां भजाम्यहम् ।
प्रसीद सकलान् कामान्, प्रयच्छ मम सर्वदा ।।
।। फल-श्रुति ।।
श्रीमहा-भैरवस्येदं, स्तोत्र सूक्तं सु-दुर्लभम् ।
मन्त्रात्मकं महा-पुण्यं, सर्वैश्वर्य-प्रदायकम् ।।
यः पठेन्नित्यमेकाग्रं, पातकैः स विमुच्यते ।
लभते चामला-लक्ष्मीमष्टैश्वर्यमवाप्नुयात् ।।
चिन्तामणिमवाप्नोति, धेनुं कल्पतरुं ध्रुवम् ।
स्वर्ण-राशिमवाप्नोति, सिद्धिमेव स मानवः ।।
संध्याय यः पठेत्स्तोत्र, दशावृत्त्या नरोत्तमैः ।
स्वप्ने श्रीभैरवस्तस्य, साक्षाद् भूतो जगद्-गुरुः ।
स्वर्ण-राशि ददात्येव, तत्क्षणान्नास्ति संशयः ।
सर्वदा यः पठेत् स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः ।।
लोक-त्रयं वशी कुर्यात्, अचलां श्रियं चाप्नुयात् ।
न भयं लभते क्वापि, विघ्न-भूतादि-सम्भव ।।
म्रियन्ते शत्रवोऽवश्यम लक्ष्मी-नाशमाप्नुयात् ।
अक्षयं लभते सौख्यं, सर्वदा मानवोत्तमः ।।
अष्ट-पञ्चाशताणढ्यो, मन्त्र-राजः प्रकीर्तितः ।
दारिद्र्य-दुःख-शमनं, स्वर्णाकर्षण-कारकः ।।
य येन संजपेत् धीमान्, स्तोत्र वा प्रपठेत् सदा ।
महा-भैरव-सायुज्यं, स्वान्त-काले भवेद् ध्रुवं ।।
मूल-मन्त्रः-
“ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं सः वं आपदुद्धारणाय अजामल-बद्धाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण-भैरवाय मम दारिद्र्य-विद्वेषणाय श्रीं महा-भैरवाय नमः ।
 श्री नाकोडा भैरव चालीसा


दोहा
पार्श्वनाथ भगवान की, मूरत चित् बसाए
भैरव चालीसा लिखू, गाता मन हरसाए
श्री नाकोडा भैरव सुखकारी, गूं गाती है दुनिया सारी
भैरव की महिमा अति भारी, भैरव का नाम जपे नर नारी
जिनवर के है आज्ञाकारी, श्रद्धा रखते संकित धारी
प्रात: उठे जो भेरू ध्याता, रिद्धि सिद्धि सब सम्पद पाता
भेरू नाम जपे जो कोई, उस घर मैं नित् मंगल होई
नाकोडा लाखो नर आवे, श्रद्धा से प्रसाद चडावे
भैरव भैरव आन पुकारे, भक्तो के सब कष्ठ निवारे
भैरव दर्शन शक्तिशाली, दर से कोई न जावे खाली
जो नर निथ उठ तुमको ध्यावे, भूत पास आने नहीं पावे
डाकन छु मंतर होजावे, दुष्ट देव आडे नहीं आवे
मारवाड की दिव्य मणि है, हम सब के तो आप धनि है
कल्पतरु है पर्तिख भेरू, इच्छित देता सब को भेरू
अधि व्याधि सब दोष मिटावे, सुमिरत भेरू शांति पावे
बाहर पर्देसे जावे नर, नाम मंत्र भेरू का लेकर
चोगडिया दूषण मिट जावे, काल राहू सब नाठा जावे
परदेशो मैं नाम कमावे, मन वांछित धन सम्पद पावे
तन मैं साथा मन मैं साथा, जो भेरू को नित्य मनाता
डूंगर वासी काला भैरव, सुख कारक है गोरा भैरव
जो नर भक्ति से गुण गावें, दिव्य रत्न सुख मंगल पावे
श्रद्धा से जो शीश झुकावे, भेरू अमृत रस बरसावे
मिलजुल सब नर फेरे माला, पीते सब अमृत का प्याला
मेघ झरे जो झरते निर्झर, खुशाली चावे धरती पर
अन्न सम्पदा भर भर पावे, चारो और सुकाल बनावे
भेरू है सचा रखवाला, दुश्मन मित्र बनाने वाला
देश देश मैं भेरू गांजे , खूंट खूंट मैं डंका बाजे
है नहीं अपना जिनके कोई, भेरू सहायक उनके होई
नाभि केंद्रे से तुम्हे बुलावे, भेरू झट पट दौड़े आवे
भूके नर की भूक मिटावे, प्यासे नर को निर् पिलावे
इधर उधर अब नहीं भटकना, भेरू के नित पाँव पकड़ना
वंचित सम्पद आन मिलेगी, सुख की कालिया नित्य खिलेगी
भेरू गन खरतर के देवा, सेवा से पाते नर मेवा
किर्तिरत्न की आज्ञा पाते, हुक्म हाजिरी सदा बजाते
ओं ह्रीं भैरव बम बम भैरव, कष्ट निवारक भोला भैरव
नैन मुंध धुन रात लगावे, सपने मैं वो दर्शन पावे
प्रश्नो के उत्तर झट मिलते, रास्ते के कनकट सब मिटते
नाकोडा भेरू नित् ध्यावो, संकट मेटों मंगल पावो
भेरू जपंता मालन माला, बुझ जाती दुखो की ज्वाला
निथ उठ जो चालीसा गावे, धन सुत से घर स्वर्ग बनावे
दोहा
भेरू चालीसा पढ़े मन में श्रद्धा धार
कष्ट कटे महिमा बढे सम्पद होत अपार
जिन कांति सूरी गुरु राज के शिष्य मणिप्रभराय
भैरव के सानिध्य में यह चालीसा गाये

 Beej Mantras




Om: ॐ


This beej mantra is the mystic name for the Hindu Trimurti, and represents the union of the three gods, viz. ‘A’ for Brahma, ‘U’ for Vishnu and ‘M’ for Mahadev Shiva. The three sounds also symbolize the three Vedas (Rigveda, Samaveda, Yajurveda).


Kreem:  क्रीं


This is Goddess Kali beej mantra. Kali Mata gives us health, strength, all round success and protects from evil powers. This mantra creates a strong base for Kali Mahavidya Sadhana. In this mantra ‘ Ka ' is Maa Kali , ‘ Ra ' is Brahman, and ‘ ee ' is Mahamaya. ‘ Nada ' is the Mother of the Universe, and bindu is the dispeller of sorrow.


Shreem:  श्रीं


This is the beej mantra for Goddess Mahalaxmi. It is recited for wealth, material gains, success in business or profession, elimination of ailments & worries, protection, getting beautiful wife, happy married life and all round success.  ‘ Sha ' is Maha Lakshmi, ‘ Ra ' means wealth. ‘ Ee ' is satisfaction or contentment. Nada is the manifested Brahman, and bindu is the dispeller of sorrow.


Hroum:  ह्रौं


This is the beej mantra for Lord Shiva. Lord Shiva protects from sudden death, fatal diseases, gives immortality, moksha and all round success if a person recites it with devotion along with the mantras of Shiva.


Doom:  दुं


This is the beej Mantra of Maa Durga . It is recited for power, strength,protection, health, wealth, victory, wisdom, knowledge, elimination of enemies & grave problems, happy married life and all round success. ‘ Da ' means Durga, and ‘ U ' means to protect. Nada means Mother of the universe, and bindu signifies worship.


Hreem: ह्रीं


This is the Mantra of Mahamaya or Bhuvaneshwari. The best and the most powerful make a person leader of men and help get a person all he needs. ‘ Ha ' means Shiva, ‘ Ra ' is prakriti, ‘ ee ' means Mahamaya. Nada is the Mother of the Universe, and bindu is the dispeller of sorrow.


Ayeim: ऐं


This is the beej Mantra of Devi Saraswati. Goddess Saraswati is the goddess of knowledge of all fields and with the recitation of this mantra one can attain knowledge, wisdom and success in any field.  ‘ Ai ' stands for Saraswati, and bindu is the dispeller of sorrow.


Gam: गं


This is the  beej mantra of Lord Ganapati. Lord Ganesha gives His devotees knowledge, wisdom, protection, fortune, happiness, health, wealth and eliminate all obstacles. ‘ Ga ' means Ganesha, and bindu is the dispeller of sorrow.


Fraum: फ्रौं


This is the beej mantra for Lord Hanuman. Chanting of it gives unlimited strength, power, protection, wisdom, happiness, elimination of bad spirits & ghosts, victory over enemies and all round success.


Dam: दं


This is beej mantra for Lord Vishnu. With recitation of it a person gets wealth, health, protection, happy married life, happiness, victory and all round success.


Bhram: भ्रं


This is the beej mantra of Lord Bhairav. It is recited for strength, protection, victory, health, wealth, happiness, fame, success in court cases, elimination of enemies, and all round success.


Dhoom: धूं


This is the beej mantra for Goddess Dhoomavati. Chanting of this mantra gives quick eradication of all enemies, strength, fortune, protection, health, wealth and all round success.


Hleem: हलीं


This is the beej mantra for Goddess Bagalamukhi. It is recited for quick elimination of all enemies, power, victory, fame, and all round success.


Treem : त्रीं


This is the beej mantra for Goddess Tara. Recitation of this mantra gives unending financial gain, unlimited wealth, fortune, fame, happiness, victory and all round success.


Kshraum: क्ष्रौं


This is a beej mantra of Lord Narsimha. Lord Narsimha removes humans all sorrows and fears and bring quick victory over enemies.  This also creates a strong base for other Narsimha sadhanas.


Dhham: धं


This is the beej mantra of Lord Kuber. It is recited for massive monetary gain, wealth, fortune and all round success.


Ham: हं


This beej mantra is receited for awakening of Kundalini. It is chanted for activating the Akash Tatva (space element) in us which gets us siddhis and eliminates ailments related to this element.


Ram: रां


This beej mantra is related to Agni Tatva (fire element). Chanting of this mantra activates the Agni Tatva and eliminates ailments related to this element. It is helpful for quicker awakening of Kundalini.


Yam: यं


This beej mantra is related to Vayu Tatva (air element). Chanting of this mantra activates the Vayu Tatva and eliminates ailments related to this element. Activation of all elements leads to quicker awakening of Kundalini


Ksham: क्षं


This is related to the Prithvi Tatva (earth element) in us which gets us siddhis and eliminates ailments related to this element. Activation of all elements leads to quicker awakening of Kundalini and enables a sadhak to access all supernatural powers.


Tam: तं


This beej mantra is for getting rid of disease, worry, fear and illusions.

 श्री अन्नपूर्णा स्तोत्रम्



नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी
निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१॥
नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी
मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।
काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥२॥
योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।
सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥३॥
कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी ।
मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥
दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।
श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥५॥
उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी
वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी ।
सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥६॥
आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी
काश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी ।
कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥७॥
देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी
वामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।
भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥८॥
चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी
चन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।
मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥९॥
क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी
साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१०॥
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥११॥
माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१२॥
 श्री रामाष्टकम्



(श्री व्यासविरचितम्)
भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम् ।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव राममद्वयम् ॥ १ ॥
जटाकलापशोभितं समस्तपापनाशकं ।
स्वभक्तभीतिभञ्जनं भजे ह राममद्वयम् ॥ २ ॥
निजस्वरूपबोधकं कृपाकरं भवापहम् ।
समं शिवं निरञ्जनं भजे ह राममद्वयम् ॥ ३ ॥
सहप्रपञ्चकल्पितं ह्यनामरूपवास्तवम् ।
निराकृतिं निरामयं भजे ह राममद्वयम् ॥ ४ ॥
निष्प्रपञ्चनिर्विकल्पनिर्मलं निरामयम् ।
चिदेकरूपसन्ततं भजे ह राममद्वयम् ॥ ५ ॥
भवाब्धिपोतरूपकं ह्यशेषदेहकल्पितम् ।
गुणाकरं कृपाकरं भजे ह राममद्वयम् ॥ ६ ॥
महावाक्यबोधकैर्विराजमानवाक्पदैः ।
परं ब्रह्मसद्व्यापकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ७ ॥
शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम् ।
विराजमानदेशिकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ८ ॥
रामाष्टकं पठति यस्सुखदं सुपुण्यं
व्यासेन भाषितमिदं शृणुते मनुष्यः
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं
संप्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ॥ ९ ॥
॥ इति श्रीव्यासविरचितं रामाष्टकं संपूर्णम् ॥
 श्री सूर्यमण्डलाष्टक स्तोत्रम्  


नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाश हेतवे । 
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरञ्चि नारायण शंकरात्मने ॥ १ ॥ 
यन्मडलं दीप्तिकरं विशालं रत्नप्रभं तीव्रमनादिरुपम् । 
दारिद्र्यदुःखक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ २ ॥ 
यन्मण्डलं देवगणै: सुपूजितं विप्रैः स्तुत्यं भावमुक्तिकोविदम् । 
तं देवदेवं प्रणमामि सूर्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ३ ॥ 
यन्मण्डलं ज्ञानघनं, त्वगम्यं, त्रैलोक्यपूज्यं, त्रिगुणात्मरुपम् । 
समस्ततेजोमयदिव्यरुपं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ४ ॥ 
यन्मडलं गूढमतिप्रबोधं धर्मस्य वृद्धिं कुरुते जनानाम् । 
यत्सर्वपापक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ५ ॥ 
यन्मडलं व्याधिविनाशदक्षं यदृग्यजु: सामसु सम्प्रगीतम् । 
प्रकाशितं येन च भुर्भुव: स्व: पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ६ ॥ 
यन्मडलं वेदविदो वदन्ति गायन्ति यच्चारणसिद्धसंघाः । 
यद्योगितो योगजुषां च संघाः पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ७ ॥ 
यन्मडलं सर्वजनेषु पूजितं ज्योतिश्च कुर्यादिह मर्त्यलोके । 
यत्कालकल्पक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ८ ॥ 
यन्मडलं विश्वसृजां प्रसिद्धमुत्पत्तिरक्षाप्रलयप्रगल्भम् । 
यस्मिन् जगत् संहरतेऽखिलं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ९ ॥ 
यन्मडलं सर्वगतस्य विष्णोरात्मा परं धाम विशुद्ध तत्त्वम् । 
सूक्ष्मान्तरैर्योगपथानुगम्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १० ॥ 
यन्मडलं वेदविदि वदन्ति गायन्ति यच्चारणसिद्धसंघाः । 
यन्मण्डलं वेदविदः स्मरन्ति पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ११ ॥ 
यन्मडलं वेदविदोपगीतं यद्योगिनां योगपथानुगम्यम् । 
तत्सर्ववेदं प्रणमामि सूर्य पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १२ ॥ 
मण्डलात्मकमिदं पुण्यं यः पठेत् सततं नरः । 
सर्वपापविशुद्धात्मा सूर्यलोके महीयते ॥ १३ ॥ 
॥ इति श्रीमदादित्यहृदये मण्डलात्मकं स्तोत्रं संपूर्णम् ॥
 श्रीपांडुरंगाष्टकम् 



महायोगपीठे तटे भीमरथ्या वरं पुंडरीकाय दातुं मुनीद्रैः । 
समागत्य तिष्टंतमानंदकदं परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगं ॥ १ ॥ 
तडिद्वाससं नीलमेघावभासं रमामंदिरं सुंदरं चित्प्रकाशम् । 
वरं त्विष्टिकायां समन्यस्तपादं परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगं ॥ २ ॥ 
प्रमाणं भवाब्धेरिदं मामकानां नितंबः कराभ्यां धृतो येन तस्मात् । 
विधातुर्वसत्यै धृतो नाभिकोशः परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगं ॥ ३ ॥ 
स्फुरत्कौस्तुभालंकृतं कंठदेशे श्रिया जुष्टकेयूरकं श्रीनिवासम् । 
शिवं शान्तमीड्यं वरं लोकपालं परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगं ॥ ४ ॥ 
शरचंद्रबिबाननं चारुहासं लसत्कुंडलक्रान्तगंडस्थलांगम् । 
जपारागबिंबाधरं कंजनेत्रम् परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगं ॥ ५ ॥ 
किरीटोज्ज्वलत्सर्वदिक् प्रान्तभागं सुरैरर्चितं दिव्यरत्नैरमर्घ्यैः । 
त्रिभंगाकृतिं बर्हमाल्यावतंसं परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगं ॥ ६ ॥ 
विभुं वेणुनादं चरन्तं दुरन्तं स्वयं लीलया गोपवेषं दधानम् । 
गवां वृंदकानन्दनं चारुहासं परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगं ॥ ७ ॥ 
अजं रुक्मिणीप्राणसंजीवनं तं परं धाम कैवल्यमेकं तुरीयम् । 
प्रसन्नं प्रपन्नार्तिहं देवदेवं परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगं ॥ ८ ॥ 
स्तवं पांडुरंगस्य वै पुण्यदं ये पठन्त्येकचित्तेन भक्त्या च नित्यम् । 
भवांबोनिधिं तेऽपि तीर्त्वाऽन्तकाले हरेरालयं शाश्र्वतं प्राप्नुवन्ति ॥ ९ ॥ 
॥ इति श्री परम पूज्य शंकराचार्यविरचितं श्रीपांडुरंगाष्टकं संपूर्णं ॥ 
 ॥ श्री महालक्ष्म्यष्टकम् ॥


श्री गणेशाय नमः
नमस्तेस्तू महामाये श्रीपिठे सूरपुजिते ।
शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ १ ॥
नमस्ते गरूडारूढे कोलासूर भयंकरी ।
सर्व पाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ २ ॥
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी ।
सर्व दुःख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥३ ॥
सिद्धीबुद्धूीप्रदे देवी भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी ।
मंत्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ४ ॥
आद्यंतरहिते देवी आद्यशक्ती महेश्वरी ।
योगजे योगसंभूते महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ५ ॥
स्थूल सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ती महोदरे ।
महापाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ६ ॥
पद्मासनस्थिते देवी परब्रम्हस्वरूपिणी ।
परमेशि जगन्मातर्र महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ७ ॥
श्वेतांबरधरे देवी नानालंकार भूषिते ।
जगत्स्थिते जगन्मार्त महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ८ ॥
महालक्ष्म्यष्टकस्तोत्रं यः पठेत् भक्तिमान्नरः ।
सर्वसिद्धीमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥ ९ ॥
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनं ।
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्य समन्वितः ॥१०॥
त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रूविनाशनं ।
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥११॥
॥इतिंद्रकृत श्रीमहालक्ष्म्यष्टकस्तवः संपूर्णः ॥
 काल भैरव अष्टक


देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥
शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ४॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥
॥ फल श्रुति॥
कालभैरवाष्टकं पठंति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥
॥इति कालभैरवाष्टकम् संपूर्णम् ॥
 श्रीविश्वनाथाष्टकम्


गङ्गा तरङ्ग रमणीय जटा कलापं
गौरी निरन्तर विभूषित वाम भागं
नारायण प्रियमनङ्ग मदापहारं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् (१)
वाचामगोचरमनेक गुण स्वरूपं
वागीश विष्णु सुर सेवित पाद पद्मं
वामेण विग्रह वरेन कलत्रवन्तं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् (२)
भूतादिपं भुजग भूषण भूषिताङ्गं
व्याघ्राञ्जिनां बरधरं, जटिलं, त्रिनेत्रं
पाशाङ्कुशाभय वरप्रद शूलपाणिं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् (३)
सीतांशु शोभित किरीट विराजमानं
बालेक्षणातल विशोषित पञ्चबाणं
नागाधिपा रचित बासुर कर्ण पूरं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् (४)
पञ्चाननं दुरित मत्त मतङ्गजानां
नागान्तकं धनुज पुङ्गव पन्नागानां
दावानलं मरण शोक जराटवीनां
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् (५)
तेजोमयं सगुण निर्गुणमद्वितीयं
आनन्द कन्दमपराजित मप्रमेयं
नागात्मकं सकल निष्कलमात्म रूपं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् (६)
आशां विहाय परिहृत्य परश्य निन्दां
पापे रथिं च सुनिवार्य मनस्समाधौ
आधाय हृत्-कमल मध्य गतं परेशं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् (७)
रागाधि दोष रहितं स्वजनानुरागं
वैराग्य शान्ति निलयं गिरिजा सहायं
माधुर्य धैर्य सुभगं गरलाभिरामं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् (८)
वाराणसी पुर पते स्थवनं शिवस्य
व्याख्यातम् अष्टकमिदं पठते मनुष्य
विद्यां श्रियं विपुल सौख्यमनन्त कीर्तिं
सम्प्राप्य देव निलये लभते च मोक्षम् ॥
विश्वनाधाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेः शिव सन्निधौ
शिवलोकमवाप्नोति शिवेनसह मोदते ॥
 श्री दुर्गा आपदुद्धाराष्टकम्



नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे नमस्ते जगद्व्यापिके विश्वरूपे |
नमस्ते जगद्वन्द्यपादारविन्दे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ||१||
नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे नमस्ते महायोगिविज्ञानरूपे |
नमस्ते नमस्ते सदानन्द रूपे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ||२||
अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः |
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ||३||
अरण्ये रणे दारुणे शुत्रुमध्ये जले सङ्कटे राजग्रेहे प्रवाते |
त्वमेका गतिर्देवि निस्तार हेतुर्नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ||४||
अपारे महदुस्तरेऽत्यन्तघोरे विपत् सागरे मज्जतां देहभाजाम् |
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ||५||
नमश्चण्डिके चण्डोर्दण्डलीलासमुत्खण्डिता खण्डलाशेषशत्रोः |
त्वमेका गतिर्विघ्नसन्दोहहर्त्री नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ||६||
त्वमेका सदाराधिता सत्यवादिन्यनेकाखिला क्रोधना क्रोधनिष्ठा |
इडा पिङ्गला त्वं सुषुम्ना च नाडी नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ||७||
नमो देवि दुर्गे शिवे भीमनादे सरस्वत्यरुन्धत्यमोघस्वरूपे  |
विभूतिः सतां कालरात्रिस्वरूपे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ||८||
शरणमसि सुराणां सिद्धविद्याधराणां मुनिदनुजवराणां व्याधिभिः पीडितानाम् |
नृपतिगृहगतानां दस्युभिस्त्रासितानां त्वमसि शरणमेका देवि दुर्गे प्रसीद ||९||
|| इति सिद्धेश्वरतन्त्रे हरगौरीसंवादे आपदुद्धाराष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||
 श्री गणेश मंगलाष्टकम



गजाननाय गांगेय सहजाय सर्दात्मने!
गौरी प्रियतनूजाय गणेषयास्तु मंगलम!!१!!
नागयज्ञोपवीताय नतविध्न विनाशिने!
नन्द्यादिगणनाथाय नायाकायास्तु मंगलम!!२!!
इभवक्त्राय चंद्रादिवन्दिताय चिदात्मने!
ईशान प्रेमपात्राय चेष्टादायास्तु मंगलम!!३!!
सुमुखाय सुशुन्डाग्रोक्षिप्तामृत घटाय च!
सुखरींदनिवे व्यय सुखदायास्तु मंगलम!!४!!
चतुर्भुजाय चन्द्राय विलसन्मस्तकाय च!
चरणावनतानन्ततारणायास्तु मंगलम!!५!!
वक्रतुण्डाय वटवे वन्धाय वरदाय च!
विरूपाक्षसुतायास्तु विघ्ननाशाय मंगलम!!६!!
प्रमोदामोदरूपाय सिद्धिविज्ञानरुपिणे !
प्रकृष्टपापनाशाय फलदायास्तु मंगलम!!७!!
मंगलं गणनाथाय मंगलं हरसूनवे !
मंगलं विघ्नराजाय विघ्न हत्रेंस्तु मंगलम!!८!!
श्लोकाष्टकमि पुण्यं मंगलप्रदमादरात !
पठितव्यं प्रयत्नेन सर्वविघ्ननिवृत्तये !!९!!
इति श्री गणपति मंगलाष्टकम !!
 श्री हनुमान साठिका


॥दोहा॥
बीर बखानौं पवनसुत,जनत सकल जहान ।
धन्य-धन्य अंजनि-तनय , संकर, हर, हनुमान्॥

।।चौपाइयां।।
जय-जय-जय हनुमान अडंगी | महावीर विक्रम बजरंगी ||
जय कपिश जय पवन कुमारा | जय जग बंदन सील अगारा ||
जय आदित्य अमर अबिकारी | अरि मरदन जय-जय गिरिधारी ||
अंजनी उदर जन्म तुम लीन्हा | जय जयकार देवतन कीन्हा ||
बाजे दुन्दुभि गगन गंभीरा | सुर मन हर्ष असुर मं पीरा ||
कपि के डर गढ़ लंक सकानी | छूटे बंध देवतन जानी ||
ऋषि समूह निकट चलि आये | पवन-तनय के पद सिर नाये ||
बार-बार स्तुति करी नाना | निर्मल नाम धरा हनुमाना ||
सकल ऋषिन मिली अस मत ठाना | दीन्ह बताय लाल फल खाना ||
सुनत वचन कपि मन हर्षाना | रवि रथ उदय लाल फल जाना ||
रथ समेत कपि कीन्ह आहारा | सूर्य बिना भये अति अंधियारा ||
विनय तुम्हार करै अकुलाना | तब कपिस की अस्तुति ठाना ||
सकल लोक वृतांत सुनावा | चतुरानन तब रवि उगिलावा ||
कहा बहोरी सुनहु बलसीला | रामचंद्र करिहैं बहु लीला ||
तब तुम उनकर करेहू सहाई | अबहीं बसहु कानन में जाई ||
अस कही विधि निज लोक सिधारा | मिले सखा संग पवन कुमारा ||
खेलै खेल महा तरु तोरें | ढेर करें बहु पर्वत फोरें ||
जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई | गिरि समेत पातालहि जाई ||
कपि सुग्रीव बालि की त्रासा | निरखति रहे राम मागु आसा ||
मिले राम तहं पवन कुमारा | अति आनंद सप्रेम दुलारा ||
मनि मुंदरी रघुपति सों पाई | सीता खोज चले सिरु नाई ||
सतयोजन जलनिधि विस्तारा | अगम-अपार देवतन हारा ||
जिमि सर गोखुर सरिस कपीसा | लांघि गये कपि कही जगदीशा ||
सीता-चरण सीस तिन्ह नाये | अजर-अमर के आसिस पाये ||
रहे दनुज उपवन रखवारी | एक से एक महाभट भारी ||
तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा | दहेउ लंक कोप्यो भुज बीसा ||
सिया बोध दै पुनि फिर आये | रामचंद्र के पद सिर नाये ||
मेरु उपारि आप छीन माहीं | बाँधे सेतु निमिष इक मांहीं ||
लक्ष्मण-शक्ति लागी उर जबहीं | राम बुलाय कहा पुनि तबहीं ||
भवन समेत सुषेन लै आये | तुरत सजीवन को पुनि धाय ||
मग महं कालनेमि कहं मारा | अमित सुभट निसि-चर संहारा ||
आनि संजीवन गिरि समेता | धरि दिन्हौ जहं कृपा निकेता ||
फन पति केर सोक हरि लीन्हा | वर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा ||
अहिरावन हरि अनुज समेता | लै गयो तहां पाताल निकेता ||
जहाँ रहे देवि अस्थाना | दीन चहै बलि कढी कृपाना ||
पवन तनय प्रभु किन गुहारी | कटक समेत निसाचर मारी ||
रीछ किसपति सबै बहोरी | राम-लखन किने यक ठोरी ||
सब देवतन की बन्दी छुडाये | सो किरति मुनि नारद गाये ||
अछय कुमार दनुज बलवाना | काल केतु कहं सब जग जाना ||
कुम्भकरण रावण का भाई | ताहि निपात कीन्ह कपिराई ||
मेघनाद पर शक्ति मारा | पवन तनय तब सो बरियारा ||
रहा तनय नारान्तक जाना | पल में हते ताहि हनुमाना ||
जहं लगि भान दनुज कर पावा | पवन-तनय सब मारि नसावा ||
जय मारुतसुत जय अनुकूला | नाम कृसानु सोक तुला ||
जहं जीवन के संकट होई | रवि तम सम सो संकट खोई ||
बंदी परै सुमिरै हनुमाना | संकट कटे घरै जो ध्याना ||
जाको बंध बामपद दीन्हा | मारुतसुत व्याकुल बहु कीन्हा ||
सो भुजबल का कीन कृपाला | अच्छत तुम्हे मोर यह हाला ||
आरत हरन नाम हनुमाना | सादर सुरपति कीन बखाना ||
संकट रहै न एक रति को | ध्यान धरै हनुमान जती को ||
धावहु देखि दीनता मोरी | कहौं पवनसुत जगकर जोरी ||
कपिपति बेगि अनुग्रह करहु | आतुर आई दुसै दुःख हरहु ||
राम सपथ मै तुमहि सुनाया | जवन गुहार लाग सिय जाया ||
यश तुम्हार सकल जग जाना | भव बंधन भंजन हनुमाना ||
यह बंधन कर केतिक वाता || नाम तुम्हार जगत सुखदाता ||
करौ कृपा जय-जय जग स्वामी | बार अनेक नमामि-नमामी ||
भौमवार कर होम विधना | धुप दीप नैवेद्द सूजाना ||
मंगल दायक को लौ लावे | सुन नर मुनि वांछित फल पावें ||
जयति-2 जय-जय जग स्वामी | समरथ पुरुष सुअंतरआमी ||
अंजनि तनय नाम हनुमाना | सो तुलसी के प्राण समाना ||

।।दोहा।।
जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान।।
राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण।
।बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान।।
ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण।।
जो नित पढ़ै यह साठिका, तुलसी कहैं बिचारि।
रहै न संकट ताहि को, साक्षी हैं त्रिपुरारि।।

।।सवैया।।
आरत बन पुकारत हौं कपिनाथ सुनो विनती मम भारी।अंगद औ नल-नील महाबलि देव सदा बल की बलिहारी ।।
जाम्बवन्त् सुग्रीव पवन-सुत दिबिद मयंद महा भटभारी । दुःख दोष हरो तुलसी जन-को श्री द्वादश बीरन की बलिहारी ।।
श्री सुब्रह्मण्य अष्टाकम


हे स्वामिनाथ करुणाकर दीनबन्धो, श्रीपार्वतीशमुखपङ्कज पद्मबन्धो ।
श्रीशादिदेवगणपूजितपादपद्म, वल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥१॥
देवादिदेवनुत देवगणाधिनाथ, देवेन्द्रवन्द्य मृदुपङ्कजमञ्जुपाद ।
देवर्षिनारदमुनीन्द्रसुगीतकीर्ते, वल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥२॥
नित्यान्नदान निरताखिल रोगहारिन्, तस्मात्प्रदान परिपूरितभक्तकाम ।
शृत्यागमप्रणववाच्यनिजस्वरूप, वल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥३॥
क्रौञ्चासुरेन्द्र परिखण्डन शक्तिशूल, पाशादिशस्त्रपरिमण्डितदिव्यपाणे ।
श्रीकुण्डलीश धृततुण्ड शिखीन्द्रवाह,वल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥४॥
देवादिदेव रथमण्डल मध्य वेद्य, देवेन्द्र पीठनगरं दृढचापहस्तम् ।
शूरं निहत्य सुरकोटिभिरीड्यमान, वल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥५॥
हारादिरत्नमणियुक्तकिरीटहार, केयूरकुण्डललसत्कवचाभिराम ।
हे वीर तारक जयाज़्मरबृन्दवन्द्य, वल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥६॥
पञ्चाक्षरादिमनुमन्त्रित गाङ्गतोयैः, पञ्चामृतैः प्रमुदितेन्द्रमुखैर्मुनीन्द्रैः ।
पट्टाभिषिक्त हरियुक्त परासनाथ, वल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥७॥
श्रीकार्तिकेय करुणामृतपूर्णदृष्ट्या, कामादिरोगकलुषीकृतदुष्टचित्तम् ।
भक्त्वा तु मामवकलाधर कान्तिकान्त्या, वल्लीसनाथ मम देहि करावलम्बम् ॥८॥
सुब्रह्मण्य करावलम्बं पुण्यं ये पठन्ति द्विजोत्तमाः । ते सर्वे मुक्ति मायान्ति सुब्रह्मण्य प्रसादतः ।
सुब्रह्मण्य करावलम्बमिदं प्रातरुत्थाय यः पठेत् । कोटिजन्मकृतं पापं तत्‍क्षणादेव नश्यति ॥

Thursday, May 13, 2021

माँ अम्बे की आरती 

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
मैया जय मगंल करनी मैया जय आनन्द करनी।

तुमको निशदिन ध्यावत, मैया जी को निशदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी....

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमदको
मैया टीको मृगमदको ।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥

ॐ जय अम्बे गौरी....

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे मैया रक्ताम्बर राजै ।
रक्त-पुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै ॥

ॐ जय अम्बे गौरी....

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी मैया खड्ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी....

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती
मैया नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर, कोटिक चद्रं दिवाकर सम राजत ज्योती ॥

ॐ जय अम्बे गौरी....

शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती मैया महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥

ॐ जय अम्बे गौरी....

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे
मैया शोणित बीज हरे ।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥

ॐ जय अम्बे गौरी.....

ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी
मैया तुम कमलारानी ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी...

चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू मैया नृत्य करत भैंरू ।
बाजत ताल मृदंगा, अौर बाजत डमरू ॥

ॐ जय अम्बे गौरी....

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता
मैया तुम ही हो भरता ।
भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पति
करता ॥

ॐ जय अम्बे गौरी.....

भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी
मैया वरमुद्रा धारी ।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी.....

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती मैया अगर कपूर बाती ।
श्री मालकेतु में राजत, श्री मालकेतु कोटि रतन ज्योती ॥

ॐ जय अम्बे गौरी....

श्री अंबेजी की आरती, मैया जी की आरती जो कोइ नित गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी, कहत हरिहर स्वामी मनवांछित फल' पावे

ॐ जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी
मैया जय मगंल करनी
मैया जय आनन्द करनी।

तुम को निशदिन ध्यावत हरी ब्रह्मा शिवरी ||
Shri Ganapati aarti


सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची ।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची ॥

सर्वांगी सुंदर उटि शेंदुराची ।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ॥१॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥ध्रु०॥

रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा ।
चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा ॥

हिरेजडीत मुकुुट शोभतो बरा ।
रुणझुणती नूपरें चरणीं घागरिया ॥ जय० ॥२॥

माथा मुकुट मणी कानी कुंडले ।
सोंड दोंदावरी शेंदुर चर्चिले ।।

नागबंद सोंड-दोंद मिराविले ।
विश्वरूप तया मोरयाचे देखिले ॥ जय० ॥३॥

चतुर्भुज गणराज बाही बाहुटे ।
खाजयाचे लाडू करुनी गोमटे ।।

सुवर्णाचे ताटी शर्करा घृत ।
अर्पी तो गणराज विघ्ने वारीतो ॥ जय० ॥४॥

छत्रे चामरे तुजला मिरविती ।
उंदीराचे वाहन तुजला गणपती ।।

ऐसा तु कलीयुगी सकळीक पाहसी ।
आनंदे भक्तासी प्रसन्न होसी ॥ जय० ॥५॥

ता ता धि मि किट धि मि किट नाचे गणपती ।
ईश्वर पार्वती कौतुक पाहती ।।

ताल मृदंग वीणा घोर उमटती ।
त्यांचे छंदे करुनी नाचे गणपती ॥ जय० ॥६॥

लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना ।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना ॥

दास रामाचा वाट पाहे सदना ।
संकटीं पावावें निर्वाणीं रक्षावें सुरवर वंदना

॥ जय ० ॥ ७ ॥
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती

 कामधेनु गौ माता आरती 


ॐ जय कामधेनु गौ माता, मैया जय जय गौ माता ।

तुमको हरदिन सेवत, हर देव गण त्राता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता.


नन्दा - सुभद्रा - सुरभि, सुशीला - बहुला जगमाता ।

सूर्य - चन्द्रमा - ध्यावत, सर्व देव गाता।। ॐ जय


कामधेनु गौ माता....

विश्व रूप तुम हो, सुख सम्पति दाता ।

जो कोइ तुमको पूजत, दुख दरिद्र नही आता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....

तीनों लोक निवासिनी, अभय दान दाता ।

सर्व धर्म की मैया, पाप - ताप - हरता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....

तुम जिस घर रहती हो, अन्न-धन्न आता ।

सब के आदर पाकर, गो भक्त बन जाता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....

तुम बिन यज्ञ न होते, दविष्य न हो पाता ।

दूध दही गौलोवन, सब तुम से आता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....

कामधेनु - तुम ही कहलाती, जग में ज्योत जलाती ।

खान - पान का वैभव, सब तुमसे आता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....

गौ माता जी की आरती, जो कोर्इ नर गाता ।

उल्लास भरे ह्रदय से, सुख - आनंद पाता ।। ॐ जय कामधेनु गौ माता....

ॐ जय कामधेनु गौ माता ।।

 

 माँ वैष्णो आरती


तुमरे भवन पर ज्योत जागे ज्योत जागे रे मेरे पाप भागे

आनंद मंगल हो रही मेरी अम्बा..

ब्रह्मा जी वैद पड़ें तेरे द्वारे शंकर ध्यान लगाये मैया के द्वार्वे

शंकर ध्यान लगाये मेरी अम्बा..

नारद नृत्य करे तेरे द्वारे काहना बीन बजाये मेरी मैया के द्वार्वे ,

काहना बीन बजाये मेरी अम्बा..

पंच-रंग सुआ चोला अंग बीराजे लाल किनारी लगाये मेरी मैया के चोला,

लाल किनारी लगाये मेरी अम्बा

गल फूलों के हार बीराजे केसर तिलक लगाये मेरी मैया के माथे ,

केसर तिलक लगाये मेरी अम्बा

सर सोने दा छत्र बीराजे हीरे रतन जडये मेरी मेरी मैया के छत्र ,

हीरे रतन जडये मेरी अम्बा..

बावन वीर चोंसंठ संग योजन भेरों चवर झुलाये मेरी मैया के द्वारे,

भेरों चवर झुलाये मेरी अम्बा

लोंक्ड-वीर भवन के आगे गोरख नाद बजाये मेरी मैया के द्वारे,

गोरख नाद बजाये मेरी अम्बा..

सिमर-चरण तेरा ध्यानु यश गाये बानेकाज निभाए मेरी मैया के बाने,

बानेकाज निभाए मेरीअम्बा

आनंद मंगल हो रही मेरी अम्बा,आनंद मंगल हो रही मेरी अम्बा,

आनंद मंगल हो रही मेरी अम्बा !!


 

 ॥ आरती श्री नरसिंह भगवान की ॥

ॐ जय नरसिंह हरे, प्रभु जय नरसिंह हरे।

स्तम्भ फाड़ प्रभु प्रकटे, स्तम्भ फाड़ प्रभु प्रकटे, जन का ताप हरे॥ १ ॥
ॐ जय नरसिंह हरे॥

तुम हो दीन दयाला, भक्तन हितकारी, प्रभु भक्तन हितकारी।
अद्भुत रूप बनाकर, अद्भुत रूप बनाकर, प्रकटे भय हारी॥ २ ॥
ॐ जय नरसिंह हरे॥

सबके ह्रदय विदारण, दुस्यु जियो मारी, प्रभु दुस्यु जियो मारी।
दास जान अपनायो, दास जान अपनायो, जन पर कृपा करी॥ ३ ॥
ॐ जय नरसिंह हरे॥

ब्रह्मा करत आरती, माला पहिनावे, प्रभु माला पहिनावे।
शिवजी जय जय कहकर, पुष्पन बरसावे॥ ४ ॥
ॐ जय नरसिंह हरे॥ 

॥ इति आरती श्री नरसिंह भगवान सम्पूर्णम ॥
 श्री भैरव जी की आरती

जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा ।
जय काली और गौरा देवी कृत सेवा ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥

तुम्ही पाप उद्धारक दुःख सिन्धु तारक ।
भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥

वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी ।
महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥

तुम बिन सेवा देवा सफल नहीं होवे ।
चौमुख दीपक दर्शन सबका दुःख खोवे ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥

तेल चटकि दधि मिश्रित भाषावलि तेरी ।
कृपा करिये भैरव करिये नहीं देरी ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥

पाव घूंघरु बाजत अरु डमरु डमकावत ।
बटुकनाथ बन बालकजन मन हरषावत ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥

बटुकनाथ की आरती जो कोई नर गावे ।
कहे धरणीधर नर मनवांछित फल पावे ॥ जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा॥ 

॥ इति भैरव आरती सम्पूर्णम ॥
 श्री हनुमान साठिका

॥दोहा॥
बीर बखानौं पवनसुत,जनत सकल जहान ।
धन्य-धन्य अंजनि-तनय , संकर, हर, हनुमान्॥


।।चौपाइयां।।
जय-जय-जय हनुमान अडंगी | महावीर विक्रम बजरंगी ||
जय कपिश जय पवन कुमारा | जय जग बंदन सील अगारा ||
जय आदित्य अमर अबिकारी | अरि मरदन जय-जय गिरिधारी ||
अंजनी उदर जन्म तुम लीन्हा | जय जयकार देवतन कीन्हा ||
बाजे दुन्दुभि गगन गंभीरा | सुर मन हर्ष असुर मं पीरा ||
कपि के डर गढ़ लंक सकानी | छूटे बंध देवतन जानी ||
ऋषि समूह निकट चलि आये | पवन-तनय के पद सिर नाये ||
बार-बार स्तुति करी नाना | निर्मल नाम धरा हनुमाना ||
सकल ऋषिन मिली अस मत ठाना | दीन्ह बताय लाल फल खाना ||
सुनत वचन कपि मन हर्षाना | रवि रथ उदय लाल फल जाना ||
रथ समेत कपि कीन्ह आहारा | सूर्य बिना भये अति अंधियारा ||
विनय तुम्हार करै अकुलाना | तब कपिस की अस्तुति ठाना ||
सकल लोक वृतांत सुनावा | चतुरानन तब रवि उगिलावा ||
कहा बहोरी सुनहु बलसीला | रामचंद्र करिहैं बहु लीला ||
तब तुम उनकर करेहू सहाई | अबहीं बसहु कानन में जाई ||
अस कही विधि निज लोक सिधारा | मिले सखा संग पवन कुमारा ||
खेलै खेल महा तरु तोरें | ढेर करें बहु पर्वत फोरें ||
जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई | गिरि समेत पातालहि जाई ||
कपि सुग्रीव बालि की त्रासा | निरखति रहे राम मागु आसा ||
मिले राम तहं पवन कुमारा | अति आनंद सप्रेम दुलारा ||
मनि मुंदरी रघुपति सों पाई | सीता खोज चले सिरु नाई ||
सतयोजन जलनिधि विस्तारा | अगम-अपार देवतन हारा ||
जिमि सर गोखुर सरिस कपीसा | लांघि गये कपि कही जगदीशा ||
सीता-चरण सीस तिन्ह नाये | अजर-अमर के आसिस पाये ||
रहे दनुज उपवन रखवारी | एक से एक महाभट भारी ||
तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा | दहेउ लंक कोप्यो भुज बीसा ||
सिया बोध दै पुनि फिर आये | रामचंद्र के पद सिर नाये ||
मेरु उपारि आप छीन माहीं | बाँधे सेतु निमिष इक मांहीं ||
लक्ष्मण-शक्ति लागी उर जबहीं | राम बुलाय कहा पुनि तबहीं ||
भवन समेत सुषेन लै आये | तुरत सजीवन को पुनि धाय ||
मग महं कालनेमि कहं मारा | अमित सुभट निसि-चर संहारा ||
आनि संजीवन गिरि समेता | धरि दिन्हौ जहं कृपा निकेता ||
फन पति केर सोक हरि लीन्हा | वर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा ||
अहिरावन हरि अनुज समेता | लै गयो तहां पाताल निकेता ||
जहाँ रहे देवि अस्थाना | दीन चहै बलि कढी कृपाना ||
पवन तनय प्रभु किन गुहारी | कटक समेत निसाचर मारी ||
रीछ किसपति सबै बहोरी | राम-लखन किने यक ठोरी ||
सब देवतन की बन्दी छुडाये | सो किरति मुनि नारद गाये ||
अछय कुमार दनुज बलवाना | काल केतु कहं सब जग जाना ||
कुम्भकरण रावण का भाई | ताहि निपात कीन्ह कपिराई ||
मेघनाद पर शक्ति मारा | पवन तनय तब सो बरियारा ||
रहा तनय नारान्तक जाना | पल में हते ताहि हनुमाना ||
जहं लगि भान दनुज कर पावा | पवन-तनय सब मारि नसावा ||
जय मारुतसुत जय अनुकूला | नाम कृसानु सोक तुला ||
जहं जीवन के संकट होई | रवि तम सम सो संकट खोई ||
बंदी परै सुमिरै हनुमाना | संकट कटे घरै जो ध्याना ||
जाको बंध बामपद दीन्हा | मारुतसुत व्याकुल बहु कीन्हा ||
सो भुजबल का कीन कृपाला | अच्छत तुम्हे मोर यह हाला ||
आरत हरन नाम हनुमाना | सादर सुरपति कीन बखाना ||
संकट रहै न एक रति को | ध्यान धरै हनुमान जती को ||
धावहु देखि दीनता मोरी | कहौं पवनसुत जगकर जोरी ||
कपिपति बेगि अनुग्रह करहु | आतुर आई दुसै दुःख हरहु ||
राम सपथ मै तुमहि सुनाया | जवन गुहार लाग सिय जाया ||
यश तुम्हार सकल जग जाना | भव बंधन भंजन हनुमाना ||
यह बंधन कर केतिक वाता || नाम तुम्हार जगत सुखदाता ||
करौ कृपा जय-जय जग स्वामी | बार अनेक नमामि-नमामी ||
भौमवार कर होम विधना | धुप दीप नैवेद्द सूजाना ||
मंगल दायक को लौ लावे | सुन नर मुनि वांछित फल पावें ||
जयति-2 जय-जय जग स्वामी | समरथ पुरुष सुअंतरआमी ||
अंजनि तनय नाम हनुमाना | सो तुलसी के प्राण समाना ||


।।दोहा।।
जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान।।
राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण।
।बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान।।
ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण।।
जो नित पढ़ै यह साठिका, तुलसी कहैं बिचारि।
रहै न संकट ताहि को, साक्षी हैं त्रिपुरारि।।


।।सवैया।।
आरत बन पुकारत हौं कपिनाथ सुनो विनती मम भारी।अंगद औ नल-नील महाबलि देव सदा बल की बलिहारी ।।
जाम्बवन्त् सुग्रीव पवन-सुत दिबिद मयंद महा भटभारी । दुःख दोष हरो तुलसी जन-को श्री द्वादश बीरन की बलिहारी ।।

Friday, May 7, 2021

 श्री कुंजिका स्तोत्रम


।।शिव उवाच।।
श्रृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि, कुंजिका स्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्र प्रभावेण, चण्डी जापः शुभो भवेत।।
न कवचं नार्गला-स्तोत्रं, कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च, न न्यासो न च वार्चनम्।।
कुंजिका पाठ मात्रेण, दुर्गा पाठ फलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि ! देवानामपि दुलर्भम्।।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठ मात्रेण संसिद्धयेत् कुंजिका स्तोत्रमुत्तमम्।।

मन्त्र -
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।
नमस्ते रूद्र रुपिण्यै , नमस्ते मधु-मर्दिनि।
नमः कैटभ हारिण्यै, नमस्ते महिषार्दिनि।।
नमस्ते शुम्भ हन्त्र्यै च, निशुम्भासुर घातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जप ! सिद्धिं कुरूष्व मे।।
ऐं-कारी सृष्टि-रूपायै, ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी काल-रूपिण्यै, बीजरूपे नमोऽस्तु ते।।
चामुण्डा चण्डघाती च, यैकारी वरदायिनी।
विच्चे चा ऽभयदा नित्यं, नमस्ते मन्त्ररूपिणि।।
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नीः, वां वीं वागधीश्वरी तथा।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ।।
हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः।।
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्र सिद्धिं कुरुष्व मे॥

।।फल श्रुति।।
इदं तु कुंजिका स्तोत्रं मन्त्र-जागर्ति हेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं, गोपितं रक्ष पार्वति।।
यस्तु कुंजिकया देवि ! हीनां सप्तशती पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा।।
। इति श्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती संवादे कुंजिका स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ।

 अथ “श्री दुर्गा बत्तीस नामवली” स्त्रोत :-


दुर्गा दुर्गार्ति शमनी दुर्गापद्विनिवारिणी।

दुर्गामच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी

दुर्गम ज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला

दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी

दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता

दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी

दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी

दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी

दुर्गमाङ्गी दुर्गमाता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी

दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्लभा दुर्गधारिणी

नामावली ममायास्तु दुर्गया मम मानसः

पठेत् सर्व भयान्मुक्तो भविष्यति न संशयः।।

 1. Lakshmi Beej Mantra
ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः॥
Om Hreem Shreem Lakshmibhayo Namah॥

2. Mahalakshmi Mantra
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥
Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamalalaye Praseed Praseed
Om Shreem Hreem Shreem Mahalakshmaye Namah॥

3. Lakshmi Gayatri Mantra
ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि,
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥
Om Shree Mahalakshmyai Cha Vidmahe Vishnu Patnyai Cha Dheemahi,
Tanno Lakshmi Prachodayat Om॥
श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम्

आदिलक्ष्मी
सुमनस वन्दित सुन्दरि माधवि, चन्द्र सहोदरि हेममये 
मुनिगण वन्दित मोक्षप्रदायनि, मञ्जुल भाषिणि वेदनुते । 
पङ्कजवासिनि देव सुपूजित, सद्गुण वर्षिणि शान्तियुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, आदिलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ 1 ॥

धान्यलक्ष्मी
अयिकलि कल्मष नाशिनि कामिनि, वैदिक रूपिणि वेदमये 
क्षीर समुद्भव मङ्गल रूपिणि, मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते ।
मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि, देवगणाश्रित पादयुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, धान्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ 2 ॥


धैर्यलक्ष्मी
जयवरवर्षिणि वैष्णवि भार्गवि, मन्त्र स्वरूपिणि मन्त्रमये 
सुरगण पूजित शीघ्र फलप्रद, ज्ञान विकासिनि शास्त्रनुते । 
भवभयहारिणि पापविमोचनि, साधु जनाश्रित पादयुते 
जय जयहे मधु सूधन कामिनि, धैर्यलक्ष्मी परिपालय माम् ॥ 3 ॥

गजलक्ष्मी
जय जय दुर्गति नाशिनि कामिनि, सर्वफलप्रद शास्त्रमये 
रधगज तुरगपदाति समावृत, परिजन मण्डित लोकनुते । 
हरिहर ब्रह्म सुपूजित सेवित, ताप निवारिणि पादयुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, गजलक्ष्मी रूपेण पालय माम् ॥ 4 ॥

सन्तानलक्ष्मी
अयिखग वाहिनि मोहिनि चक्रिणि, रागविवर्धिनि ज्ञानमये 
गुणगणवारधि लोकहितैषिणि, सप्तस्वर भूषित गाननुते ।
सकल सुरासुर देव मुनीश्वर, मानव वन्दित पादयुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, सन्तानलक्ष्मी परिपालय माम् ॥ 5 ॥

विजयलक्ष्मी
जय कमलासिनि सद्गति दायिनि, ज्ञानविकासिनि गानमये 
अनुदिन मर्चित कुङ्कुम धूसर, भूषित वासित वाद्यनुते । 
कनकधरास्तुति वैभव वन्दित, शङ्करदेशिक मान्यपदे 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, विजयलक्ष्मी परिपालय माम् ॥ 6 ॥

विद्यालक्ष्मी
प्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि, शोकविनाशिनि रत्नमये 
मणिमय भूषित कर्णविभूषण, शान्ति समावृत हास्यमुखे ।
नवनिधि दायिनि कलिमलहारिणि, कामित फलप्रद हस्तयुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, विद्यालक्ष्मी सदा पालय माम् ॥ 7 ॥

धनलक्ष्मी
धिमिधिमि धिन्धिमि धिन्धिमि-दिन्धिमि, दुन्धुभि नाद सुपूर्णमये 
घुमघुम घुङ्घुम घुङ्घुम घुङ्घुम, शङ्ख निनाद सुवाद्यनुते ।
वेद पूराणेतिहास सुपूजित, वैदिक मार्ग प्रदर्शयुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, धनलक्ष्मि रूपेणा पालय माम् ॥ 8 ॥

फलशृति
श्लो॥ अष्टलक्ष्मी नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि । 
विष्णुवक्षः स्थला रूढे भक्त मोक्ष प्रदायिनि ॥
श्लो॥ शङ्ख चक्रगदाहस्ते विश्वरूपिणिते जयः ।
जगन्मात्रे च मोहिन्यै मङ्गलं शुभ मङ्गलम् ॥
Sri Ashtalakshmi

Lakshmi Devi has 8 primary forms. These 8 forms are personified as Ashta Lakshmi (Ashtalakshmi). These eight forms are as follows:


(1) Adilakshmi: Mother Lakshmi resides with Lord Narayana in Vaikuntha, the abode of Lord Narayana. She is known as Rama, which means "bringing happiness to the mankind". She is also known as Indira (who holds lotus or purity). In this form, Lakshmi is normally seen serving Sri Narayana. Adi Lakshmi or Rama Lakshmi serving Sri Narayana is symbolic of her serving the whole creation. Adi Lakshmi and Narayana are not two different entities but one only. Lakshmi is Shakti. Lakshmi is the Power of Narayana.


(2) Dhanyalakshmi: Dhanya means grains. Lakshmi is the Goddess of the Harvest and the Devi who blesses with abundance and success in harvest.


(3) Dhairyalakshmi: This form of mother Lakshmi grants the boon of infinite courage and strength. Those, who are in tune with infinite inner power, are always bound to have victory. Those who worship mother Dhairya Lakshmi lead a life with tremendous patience and inner stability.


(4) Gajalakshmi: In the holy book of Srimad Bhagavata the story of the churning of the ocean by Gods and demons is explained in detail. Sage Vyasa writes that Lakshmi came out of the ocean during the churning of the ocean (Samudra Manthan). So she is known as a daughter of the ocean. She came out of the ocean sitting on a full-bloomed lotus and also having lotus flowers in both hands with two elephants by her sides holding beautiful vessels.


(5)Santanlakshmi: In the family life, the children are the greatest treasure. Those who worship this particular form of Sri Lakshmi, known as a Santan Lakshmi, are bestowed with the grace of mother Lakshmi and have wealth in the form of desirable children with good health and a long life.


(6) Vijaylakshmi: Vijay is victory. Vijay is to get success in all undertakings and all different facets of life. Vijay is to conquer the lower nature. Hence those, with grace of mother Vijay Lakshmi, have victory everywhere, at all time, in all conditions.


(7) Dhanalakshmi: Dhana is wealth. Wealth comes in many forms: Nature, Love, Peace, Health, Prosperity, Luck, Virtues, Family, Food, Land, Water, Will Power, Intellect, Character, etc. With the grace of mother Dhana Lakshmi we will get all these in abundance.


(8) Vidyalakshmi: Vidya is education. Serenity, Regularity, Absence of Vanity, Sincerity, Simplicity, Veracity, Equanimity, Fixity, Non-irritability, Adaptability Humility, Tenacity, Integrity, Nobility, Magnanimity, Charity, Generosity and Purity are the eighteen qualities imbibed through proper education that only can give immortality.


The person who worships the goddess with Ashtalakshmi stotram is blessed with immense happiness, prosperity and wealth in life.

 ॥ श्री महालक्ष्म्यष्टकम् ॥


श्री गणेशाय नमः
नमस्तेस्तू महामाये श्रीपिठे सूरपुजिते ।
शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ १ ॥
नमस्ते गरूडारूढे कोलासूर भयंकरी ।
सर्व पाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ २ ॥
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी ।
सर्व दुःख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥३ ॥
सिद्धीबुद्धूीप्रदे देवी भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी ।
मंत्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ४ ॥
आद्यंतरहिते देवी आद्यशक्ती महेश्वरी ।
योगजे योगसंभूते महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ५ ॥
स्थूल सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ती महोदरे ।
महापाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ६ ॥
पद्मासनस्थिते देवी परब्रम्हस्वरूपिणी ।
परमेशि जगन्मातर्र महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ७ ॥
श्वेतांबरधरे देवी नानालंकार भूषिते ।
जगत्स्थिते जगन्मार्त महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ ८ ॥
महालक्ष्म्यष्टकस्तोत्रं यः पठेत् भक्तिमान्नरः ।
सर्वसिद्धीमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥ ९ ॥
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनं ।
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्य समन्वितः ॥१०॥
त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रूविनाशनं ।
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥११॥
॥इतिंद्रकृत श्रीमहालक्ष्म्यष्टकस्तवः संपूर्णः ॥
 ॥अथ श्री कनकधारा स्तोत्रम्॥श्री महालक्ष्मी


अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्।
अङ्गीकृताऽखिल-विभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदाऽस्तु मम मङ्गळदेवतायाः ॥१॥


मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपा-प्रणहितानि गताऽऽगतानि।
मालादृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥२॥


विश्वामरेन्द्रपद-वीभ्रमदानदक्ष आनन्द-हेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणर्द्ध मिन्दीवरोदर-सहोदरमिन्दिरायाः ॥३॥


आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्।
आकेकरस्थित-कनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥४॥


बाह्वन्तरे मधुजितः श्रित कौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला, कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥५॥


कालाम्बुदाळि-ललितोरसि कैटभारे-धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्ति-भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥६॥


प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत् प्रभावान् माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।
मय्यापतेत्तदिह मन्थर-मीक्षणार्धं मन्दाऽलसञ्च मकरालय-कन्यकायाः ॥७॥


दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा मस्मिन्नकिञ्चन विहङ्गशिशौ विषण्णे।
दुष्कर्म-घर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण-प्रणयिनी नयनाम्बुवाहः ॥८॥


इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।
दृष्टिः प्रहृष्ट-कमलोदर-दीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥९॥


गीर्देवतेति गरुडध्वजभामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर-वल्लभेति।
सृष्टि-स्थिति-प्रलय-केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥१०॥


श्रुत्यै नमोऽस्तु नमस्त्रिभुवनैक-फलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीय गुणाश्रयायै।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्र निकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तम-वल्लभायै ॥११॥


नमोऽस्तु नालीक-निभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधि-जन्मभूत्यै।
नमोऽस्तु सोमामृत-सोदरायै नमोऽस्तु नारायण-वल्लभायै ॥१२॥


नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै नमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै।
नमोऽस्तु देवादिदयापरायै नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥१३॥


नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै नमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥१४॥


नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै।
नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥१५॥


सम्पत्कराणि सकलेन्द्रिय-नन्दनानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरुहाक्षि।
त्वद्-वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु नान्यत् ॥१६॥


यत्कटाक्ष-समुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थसम्पदः।
सन्तनोति वचनाऽङ्गमानसैः स्त्वां मुरारि-हृदयेश्वरीं भजे ॥१७॥


सरसिज-निलये सरोजहस्ते धवळतरांशुक-गन्ध-माल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवन-भूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥१८॥


दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट स्वर्वाहिनीविमलचारु-जलप्लुताङ्गीम्।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिराजगृहिणीम मृताब्धिपुत्रीम् ॥१९॥


कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूर-तरङ्गितैरपाङ्गैः।
अवलोकय मामकिञ्चनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥२०॥


स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते भुविबुधभाविताशयाः ॥२१॥


॥श्रीमदाध्यशङ्कराचार्यविरचितं श्री कनकधारा स्तोत्रम् समाप्तम्॥
 ॥ श्री लक्ष्मीनारायण कवचम् ॥


अधुना देवि वक्ष्यामि लक्ष्मीनारायणस्य ते ।
कवचं मन्त्रगर्भं च वज्रपञ्जरकाख्यया ॥ १॥
श्रीवज्रपञ्जरं नाम कवचं परमाद्भुतम् ।
रहस्यं सर्वदेवानां साधकानां विशेषतः ॥ २॥
यं धृत्वा भगवान् देवः प्रसीदति परः पुमान् ।
यस्य धारणमात्रेण ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ३
ईश्वरोऽहं शिवो भीमो वासवोऽपि दिवस्पतिः ।
सूर्यस्तेजोनिधिर्देवि चन्द्रर्मास्तारकेश्वरः ॥ ४॥
वायुश्च बलवांल्लोके वरुणो यादसाम्पतिः ।
कुबेरोऽपि धनाध्यक्षो धर्मराजो यमः स्मृतः ॥ ५॥
यं धृत्वा सहसा विष्णुः संहरिष्यति दानवान् ।
जघान रावणादींश्च किं वक्ष्येऽहमतः परम् ॥ ६॥
कवचस्यास्य सुभगे कथितोऽयं मुनिः शिवः ।
त्रिष्टुप् छन्दो देवता च लक्ष्मीनारायणो मतः ॥ ७॥
रमा बीजं परा शक्तिस्तारं कीलकमीश्वरि ।
भोगापवर्गसिद्ध्यर्थं विनियोग इति स्मृतः ॥ ८॥
ॐ अस्य श्रीलक्ष्मीनारायणकवचस्य शिवः ऋषिः ,
त्रिष्टुप् छन्दः , श्रीलक्ष्मीनारायण देवता ,
श्रीं बीजं , ह्रीं शक्तिः , ॐ कीलकं ,
भोगापवर्गसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः ।
अथ ध्यानम् । पूर्णेन्दुवदनं पीतवसनं कमलासनम् ।
लक्ष्म्या श्रितं चतुर्बाहुं लक्ष्मीनारायणं भजे ॥ ९॥
अथ कवचम् । ॐ वासुदेवोऽवतु मे मस्तकं सशिरोरुहम् ।
ह्रीं ललाटं सदा पातु लक्ष्मीविष्णुः समन्ततः ॥ १०॥
ह्सौः नेत्रेऽवताल्लक्ष्मीगोविन्दो जगतां पतिः ।
ह्रीं नासां सर्वदा पातु लक्ष्मीदामोदरः प्रभुः ॥ ११॥
 श्रीसूक्तम् 



ॐ हिरण्यवर्णाम हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥२॥

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मादेवी जुषताम्॥३॥

कांसोस्मितां हिरण्यप्राकारां आद्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वयेश्रियम्॥४॥

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियंलोके देव जुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥५॥

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तववृक्षोथ बिल्व:।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मी:॥६॥

उपैतु मां देवसख: कीर्तिश्चमणिना सह।
प्रादुर्भुतो सुराष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृध्दिं ददातु मे॥७॥

क्षुत्पपासामलां जेष्ठां अलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृध्दिं च सर्वानिर्णुद मे गृहात॥८॥

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरिं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥९॥

मनस: काममाकूतिं वाच: सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्री: श्रेयतां यश:॥१०॥

कर्दमेनप्रजाभूता मयिसंभवकर्दम।
श्रियं वासयमेकुले मातरं पद्ममालिनीम्॥११॥

आप स्रजन्तु सिग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥१२॥

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टि पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१३॥

आर्द्रां य: करिणीं यष्टीं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आवह॥१४॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥१५॥

य: शुचि: प्रयतोभूत्वा जुहुयाादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्च च श्रीकाम: सततं जपेत्॥१६॥

पद्मानने पद्मउरू पद्माक्षि पद्मसंभवे।
तन्मे भजसि पद्मक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्॥१७॥

अश्वदायै गोदायै धनदायै महाधने।
धनं मे लभतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे॥१८॥

पद्मानने पद्मविपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विष्णुमनोनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि संनिधस्त्वं॥१९॥

पुत्रपौत्रं धनंधान्यं हस्ताश्वादिगवेरथम्।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे॥२०॥

धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्योधनं वसु।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरूणं धनमस्तु मे॥२१॥

वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृतहा।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिन:॥२२॥

न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभामति:।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत्॥२३॥

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांसुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीदमह्यम्॥२४॥

विष्णुपत्नीं क्षमां देवी माधवी माधवप्रियाम्।
लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम्॥२५॥

महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात्॥२६॥

श्रीवर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते।
धान्यं धनं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायु:॥२७॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
॥इति श्रीसूक्तं समाप्तम॥

Wednesday, April 28, 2021

श्री दुर्गा देवी अष्टोत्तर



 ॐ दुर्गायै नमः ।
ॐ दारिद्र्यशमन्यै नमः ।
ॐ दुरितघ्न्यै नमः ।
ॐ लक्ष्म्यै नमः ।
ॐ लज्जायै नमः ।
ॐ महाविद्यायै नमः ।
ॐ श्रद्धायै नमः ।
ॐ पुष्ट्यै नमः ।
ॐ स्वधायै नमः ।
ॐ ध्रुवायै नमः । 
ॐ महारात्र्यै नमः ।
ॐ महामायायै नमः ।
ॐ मेधायै नमः ।
ॐ मात्रे नमः ।
ॐ सरस्वत्यै नमः ।
ॐ शिवायै नमः ।
ॐ शशिधरायै नमः ।
ॐ शान्तायै नमः ।
ॐ शाम्भव्यै नमः ।
ॐ भूतिदायिन्यै नमः । 
ॐ तामस्यै नमः ।
ॐ नियतायै नमः ।
ॐ नार्यै नमः ।
ॐ काल्यै नमः ।
ॐ नारायण्यै नमः ।
ॐ कलायै नमः ।

ॐ ब्राह्म्यै नमः ।
ॐ वीणाधरायै नमः ।
ॐ वाण्यै नमः ।
ॐ शारदायै नमः । 
ॐ हंसवाहिन्यै नमः ।
ॐ त्रिशूलिन्यै नमः ।
ॐ त्रिनेत्रायै नमः ।
ॐ ईशानायै नमः ।
ॐ त्रय्यै नमः ।
ॐ त्रयतमायै नमः ।
ॐ शुभायै नमः ।
ॐ शङ्खिन्यै नमः ।
ॐ चक्रिण्यै नमः ।
ॐ घोरायै नमः । 
ॐ कराल्यै नमः ।
ॐ मालिन्यै नमः ।
ॐ मत्यै नमः ।
ॐ माहेश्वर्यै नमः ।
ॐ महेष्वासायै नमः ।
ॐ महिषघ्न्यै नमः ।
ॐ मधुव्रतायै नमः ।
ॐ मयूरवाहिन्यै नमः ।
ॐ नीलायै नमः ।
ॐ भारत्यै नमः । 
ॐ भास्वराम्बरायै नमः ।
ॐ पीताम्बरधरायै नमः ।
ॐ पीतायै नमः ।
ॐ कौमार्यै नमः ।
ॐ पीवरस्तन्यै नमः ।
ॐ रजन्यै नमः ।
ॐ राधिन्यै नमः ।
ॐ रक्तायै नमः ।
ॐ गदिन्यै नमः ।
ॐ घण्टिन्यै नमः । 
ॐ प्रभायै नमः ।
ॐ शुम्भघ्न्यै नमः ।
ॐ सुभगायै नमः ।
ॐ सुभ्रुवे नमः ।
ॐ निशुम्भप्राणहारिण्यै नमः ।
ॐ कामाक्ष्यै नमः ।
ॐ कामुकायै नमः ।
ॐ कन्यायै नमः ।
ॐ रक्तबीजनिपातिन्यै नमः ।
ॐ सहस्रवदनायै नमः । 
ॐ सन्ध्यायै नमः ।
ॐ साक्षिण्यै नमः ।
ॐ शाङ्कर्यै नमः ।
ॐ द्युतये नमः ।
ॐ भार्गव्यै नमः ।
ॐ वारुण्यै नमः ।
ॐ विद्यायै नमः ।
ॐ धरायै नमः ।
ॐ धरासुरार्चितायै नमः ।
ॐ गायत्र्यै नमः । 
ॐ गायक्यै नमः ।
ॐ गङ्गायै नमः ।
ॐ दुर्गायै नमः ।
ॐ गीतघनस्वनायै नमः ।
ॐ छन्दोमयायै नमः ।
ॐ मह्यै नमः ।
ॐ छायायै नमः ।
ॐ चार्वाङ्ग्यै नमः ।
ॐ चन्दनप्रियायै नमः ।
ॐ जनन्यै नमः । 
ॐ जाह्नव्यै नमः ।
ॐ जातायै नमः ।
ॐ शान्ङ्कर्यै नमः ।
ॐ हतराक्षस्यै नमः ।
ॐ वल्लर्यै नमः ।
ॐ वल्लभायै नमः ।
ॐ वल्ल्यै नमः ।
ॐ वल्ल्यलङ्कृतमध्यमायै नमः ।
ॐ हरीतक्यै नमः ।
ॐ हयारूढायै नमः । 
ॐ भूत्यै नमः ।
ॐ हरिहरप्रियायै नमः ।
ॐ वज्रहस्तायै नमः ।
ॐ वरारोहायै नमः ।
ॐ सर्वसिद्ध्यै नमः ।
ॐ वरप्रदायै नमः ।
ॐ सिन्दूरवर्णायै नमः ।
ॐ श्री दुर्गादेव्यै नमः । 
श्री हयग्रीव अष्टोत्तर


 ॐ हयग्रीवाय नमः ।
ॐ महाविष्णवे नमः ।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ मधुसूदनाय नमः ।
ॐ गोविन्दाय नमः ।
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः ।
ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ विश्वम्भराय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ आदित्याय नमः ।
ॐ सर्ववागीशाय नमः ।
ॐ सर्वाधाराय नमः ।
ॐ सनातनाय नमः ।
ॐ निराधाराय नमः ।
ॐ निराकाराय नमः ।
ॐ निरीशाय नमः ।
ॐ निरुपद्रवाय नमः ।
ॐ निरञ्जनाय नमः ।
ॐ निष्कलङ्काय नमः ।
ॐ नित्यतृप्ताय नमः ॥ 
ॐ निरामयाय नमः ।
ॐ चिदानन्दमयाय नमः ।
ॐ साक्षिणे नमः ।
ॐ शरण्याय नमः ।
ॐ सर्वदायकाय नमः ।
ॐ श्रीमते नमः ।
ॐ लोकत्रयाधीशाय नमः ।
ॐ शिवाय नमः ।
ॐ सारस्वतप्रदाय नमः ।
ॐ वेदोद्धर्त्रे नमः ।
ॐ वेदनिधये नमः ।
ॐ वेदवेद्याय नमः ।
ॐ प्रबोधनाय नमः ।
ॐ पूर्णाय नमः ।
ॐ पूरयित्रे नमः ।
ॐ पुण्याय नमः ।
ॐ पुण्यकीर्तये नमः ।
ॐ परात्पराय नमः ।
ॐ परमात्मने नमः ।
ॐ परस्मै नमः ।
ॐ ज्योतिषे नमः ॥ 
ॐ परेशाय नमः ।
ॐ पारगाय नमः ।
ॐ पराय नमः ।
ॐ सर्ववेदात्मकाय नमः ।
ॐ विदुषे नमः ।
ॐ वेदवेदान्तपारगाय नमः ।
ॐ सकलोपनिषद्वेद्याय नमः ।
ॐ निष्कलाय नमः ।
ॐ सर्वशास्त्रकृते नमः ।
ॐ अक्षमालाज्ञानमुद्रायुक्तहस्ताय नमः ।
ॐ वरप्रदाय नमः ।
ॐ पुराणपुरुषाय नमः ।
ॐ श्रेष्ठाय नमः ।
ॐ शरण्याय नमः ।
ॐ परमेश्वराय नमः ।
ॐ शान्ताय नमः ।
ॐ दान्ताय नमः ।
ॐ जितक्रोधाय नमः ।
ॐ जितामित्राय नमः ।
ॐ जगन्मयाय नमः ॥ 
ॐ जन्ममृत्युहराय नमः ।
ॐ जीवाय नमः ।
ॐ जयदाय नमः ।
ॐ जाड्यनाशनाय नमः ।
ॐ जपप्रियाय नमः ।
ॐ जपस्तुत्याय नमः ।
ॐ जापकप्रियकृते नमः ।
ॐ प्रभवे नमः ।
ॐ विमलाय नमः ।
ॐ विश्वरूपाय नमः ।
ॐ विश्वगोप्त्रे नमः ।
ॐ विधिस्तुताय नमः ।
ॐ विधीन्द्रशिवसंस्तुत्याय नमः ।
ॐ शान्तिदाय नमः ।
ॐ क्षान्तिपारगाय नमः ।
ॐ श्रेयःप्रदाय नमः ।
ॐ श्रुतिमयाय नमः ।
ॐ श्रेयसां पतये नमः ।
ॐ ईश्वराय नमः ।
ॐ अच्युताय नमः ॥
ॐ अनन्तरूपाय नमः ।
ॐ प्राणदाय नमः ।
ॐ पृथिवीपतये नमः ।
ॐ अव्यक्ताय नमः ।
ॐ व्यक्तरूपाय नमः ।
ॐ सर्वसाक्षिणे नमः ।
ॐ तमोहराय नमः ।
ॐ अज्ञाननाशकाय नमः ।
ॐ ज्ञानिने नमः ।
ॐ पूर्णचन्द्रसमप्रभाय नमः ।
ॐ ज्ञानदाय नमः ।
ॐ वाक्पतये नमः ।
ॐ योगिने नमः ।
ॐ योगीशाय नमः ।
ॐ सर्वकामदाय नमः ।
ॐ महायोगिने नमः ।
ॐ महामौनिने नमः ।
ॐ मौनीशाय नमः ।
ॐ श्रेयसां निधये नमः ।
ॐ हंसाय नमः ॥ 
ॐ परमहंसाय नमः ।
ॐ विश्वगोप्त्रे नमः ।
ॐ विराजे नमः ।
ॐ स्वराजे नमः ।
ॐ शुद्धस्फटिकसङ्काशाय नमः ।
ॐ जटामण्डलसंयुताय नमः ।
ॐ आदिमध्यान्तरहिताय नमः ।
ॐ सर्ववागीश्वरेश्वराय नमः ॥
श्रीलक्ष्मीहयवदनपरब्रह्मणे नमः ।
श्री अन्नपूर्णा अष्टोत्तर

 ॐ अन्नपूर्णायै नमः
ॐ शिवायै नमः
ॐ देव्यै नमः
ॐ भीमायै नमः
ॐ पुष्ट्यै नमः
ॐ सरस्वत्यै नमः
ॐ सर्वज्ञायै नमः
ॐ पार्वत्यै नमः
ॐ दुर्गायै नमः
ॐ शर्वाण्यै नमः ॥ १०॥
ॐ शिववल्लभायै नमः
ॐ वेदवेद्यायै नमः
ॐ महाविद्यायै नमः
ॐ विद्यादात्रै नमः
ॐ विशारदायै नमः
ॐ कुमार्यै नमः
ॐ त्रिपुरायै नमः
ॐ बालायै नमः
ॐ लक्ष्म्यै नमः
ॐ श्रियै नमः ॥ २०॥
ॐ भयहारिणै नमः
ॐ भवान्यै नमः
ॐ विष्णुजनन्यै नमः
ॐ ब्रह्मादिजनन्यै नमः
ॐ गणेशजनन्यै नमः
ॐ शक्त्यै नमः
ॐ कुमारजनन्यै नमः
ॐ शुभायै नमः
ॐ भोगप्रदायै नमः
ॐ भगवत्यै नमः ॥ ३०॥
ॐ भक्ताभीष्टप्रदायिन्यै नमः
ॐ भवरोगहरायै नमः
ॐ भव्यायै नमः
ॐ शुभ्रायै नमः
ॐ परममङ्गलायै नमः
ॐ भवान्यै नमः
ॐ चञ्चलायै नमः
ॐ गौर्यै नमः
ॐ चारुचन्द्रकलाधरायै नमः
ॐ विशालाक्ष्यै नमः ॥ ४०॥
ॐ विश्वमात्रे नमः
ॐ विश्ववन्द्यायै नमः
ॐ विलासिन्यै नमः
ॐ आर्यायै नमः
ॐ कल्याणनिलायायै नमः
ॐ रुद्राण्यै नमः
ॐ कमलासनायै नमः
ॐ शुभप्रदायै नमः
ॐ शुभावर्तायै नमः
ॐ वृत्तपीनपयोधरायै नमः ॥ ५०॥
ॐ अम्बायै नमः
ॐ संहारमथन्यै नमः
ॐ मृडान्यै नमः
ॐ सर्वमङ्गलायै नमः
ॐ विष्णुसंसेवितायै नमः
ॐ सिद्धायै नमः
ॐ ब्रह्माण्यै नमः
ॐ सुरसेवितायै नमः
ॐ परमानन्ददायै नमः
ॐ शान्त्यै नमः ॥ ६०॥
ॐ परमानन्दरूपिण्यै नमः
ॐ परमानन्दजनन्यै नमः
ॐ परायै नमः
ॐ आनन्दप्रदायिन्यै नमः
ॐ परोपकारनिरतायै नमः
ॐ परमायै नमः
ॐ भक्तवत्सलायै नमः
ॐ पूर्णचन्द्राभवदनायै नमः
ॐ पूर्णचन्द्रनिभांशुकायै नमः
ॐ शुभलक्षणसम्पन्नायै नमः ॥ ७०॥
ॐ शुभानन्दगुणार्णवायै नमः
ॐ शुभसौभाग्यनिलयायै नमः
ॐ शुभदायै नमः
ॐ रतिप्रियायै नमः
ॐ चण्डिकायै नमः
ॐ चण्डमथन्यै नमः
ॐ चण्डदर्पनिवारिण्यै नमः
ॐ मार्ताण्डनयनायै नमः
ॐ साध्व्यै नमः
ॐ चन्द्राग्निनयनायै नमः ॥ ८०॥
ॐ सत्यै नमः
ॐ पुण्डरीकहरायै नमः
ॐ पूर्णायै नमः
ॐ पुण्यदायै नमः
ॐ पुण्यरूपिण्यै नमः
ॐ मायातीतायै नमः
ॐ श्रेष्ठमायायै नमः
ॐ श्रेष्ठधर्मायै नमः
ॐ आत्मवन्दितायै नमः
ॐ असृष्ट्यै नमः ॥ ९०॥
ॐ सङ्गरहितायै नमः
ॐ सृष्टिहेतवे नमः
ॐ कपर्दिन्यै नमः
ॐ वृषारूढायै नमः
ॐ शूलहस्तायै नमः
ॐ स्थितिसंहारकारिण्यै नमः
ॐ मन्दस्मितायै नमः
ॐ स्कन्दमात्रे नमः
ॐ शुद्धचित्तायै नमः
ॐ मुनिस्तुतायै नमः ॥ १००॥
ॐ महाभगवत्यै नमः
ॐ दक्षायै नमः
ॐ दक्षाध्वरविनाशिन्यै नमः
ॐ सर्वार्थदात्र्यै नमः
ॐ सावित्र्यै नमः
ॐ सदाशिवकुटुम्बिन्यै नमः
ॐ नित्यसुन्दरसर्वाङ्ग्यै नमः
ॐ सच्चिदानन्दलक्षणायै नमः
श्री सरस्वती अष्टोत्तर शतनामावली


 ॐ वाग्देव्यै नमः ।
ॐ शारदायै नमः ।
ॐ मायायै नमः ।
ॐ नादरूपिण्यै नमः ।
ॐ यशस्विन्यै नमः ।
ॐ स्वाधीनवल्लभायै नमः ।
ॐ हाहाहूहूमुखस्तुत्यायै नमः ।
ॐ सर्वविद्याप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ रञ्जिन्यै नमः ।
ॐ स्वस्तिकासनायै नमः । 
ॐ अज्ञानध्वान्तचन्द्रिकायै नमः ।
ॐ अधिविद्यादायिन्यै नमः ।
ॐ कम्बुकण्ठ्यै नमः ।
ॐ वीणागानप्रियायै नमः ।
ॐ शरणागतवत्सलायै नमः ।
ॐ श्रीसरस्वत्यै नमः ।
ॐ नीलकुन्दलायै नमः ।
ॐ वाण्यै नमः ।
ॐ सर्वपूज्यायै नमः ।
ॐ कृतकृत्यायै नमः । 
ॐ तत्त्वमय्यै नमः ।
ॐ नारदादिमुनिस्तुतायै नमः ।
ॐ राकेन्दुवदनायै नमः ।
ॐ यन्त्रात्मिकायै नमः ।
ॐ नलिनहस्तायै नमः ।
ॐ प्रियवादिन्यै नमः ।
ॐ जिह्वासिद्ध्यै नमः ।
ॐ हंसवाहिन्यै नमः ।
ॐ भक्तमनोहरायै नमः ।
ॐ दुर्गायै नमः । 
ॐ कल्याण्यै नमः ।
ॐ चतुर्मुखप्रियायै नमः ।
ॐ ब्राह्म्यै नमः ।
ॐ भारत्यै नमः ।
ॐ अक्षरात्मिकायै नमः ।
ॐ अज्ञानध्वान्तदीपिकायै नमः ।
ॐ बालारूपिण्यै नमः ।
ॐ देव्यै नमः ।
ॐ लीलाशुकप्रियायै नमः ।
ॐ दुकूलवसनधारिण्यै नमः । 
ॐ क्षीराब्धितनयायै नमः ।
ॐ मत्तमातङ्गगामिन्यै नमः ।
ॐ वीणागानविलोलुपायै नमः ।
ॐ पद्महस्तायै नमः ।
ॐ रणत्किङ्किणिमेखलायै नमः ।
ॐ त्रिलोचनायै नमः ।
ॐ अङ्कुशाक्षसूत्रधारिण्यै नमः ।
ॐ मुक्ताहारविभूषितायै नमः ।
ॐ मुक्तामण्यङ्कितचारुनासायै नमः ।
ॐ रत्नवलयभूषितायै नमः । 
ॐ कोटिसूर्यप्रकाशिन्यै नमः ।
ॐ विधिमानसहंसिकायै नमः ।
ॐ साधुरूपिण्यै नमः ।
ॐ सर्वशास्त्रार्थवादिन्यै नमः ।
ॐ सहस्रदलमध्यस्थायै नमः ।
ॐ सर्वतोमुख्यै नमः ।
ॐ सर्वचैतन्यरूपिण्यै नमः ।
ॐ सत्यज्ञानप्रबोधिन्यै नमः ।
ॐ विप्रवाक्स्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ वासवार्चितायै नमः । 
ॐ शुभ्रवस्त्रोत्तरीयायै नमः ।
ॐ विरिञ्चिपत्न्यै नमः ।
ॐ तुषारकिरणाभायै नमः ।
ॐ भावाभावविवर्जितायै नमः ।
ॐ वदनाम्बुजैकनिलयायै नमः ।
ॐ मुक्तिरूपिण्यै नमः ।
ॐ गजारूढायै नमः ।
ॐ वेदनुताय नमः ।
ॐ सर्वलोकसुपूजितायै नमः ।
ॐ भाषारूपायै नमः । 
ॐ भक्तिदायिन्यै नमः ।
ॐ मीनलोचनायै नमः ।
ॐ सर्वशक्तिसमन्वितायै नमः ।
ॐ अतिमृदुलपदाम्बुजायै नमः ।
ॐ विद्याधर्यै नमः ।
ॐ जगन्मोहिन्यै नमः ।
ॐ रमायै नमः ।
ॐ हरिप्रियायै नमः ।
ॐ विमलायै नमः ।
ॐ पुस्तकभृते नमः । 
ॐ नारायण्यै नमः ।
ॐ मङ्गलप्रदायै नमः ।
ॐ अश्वलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ धान्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ राजलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ गजलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ मोक्षलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ सन्तानलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ जयलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ खड्गलक्ष्म्यै नमः । 
ॐ कारुण्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ सौम्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ भद्रकाल्यै नमः ।
ॐ चण्डिकायै नमः ।
ॐ शाम्भव्यै नमः ।
ॐ सिंहवाहिन्यै नमः ।
ॐ सुभद्रायै नमः ।
ॐ महिषासुरमर्दिन्यै नमः ।
ॐ अष्टैश्वर्यप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ हिमवत्पुत्रिकायै नमः । 
ॐ महाराज्ञै नमः ।
ॐ त्रिपुरसुन्दर्यै नमः ।
ॐ पाशाङ्कुशधारिण्यै नमः ।
ॐ श्वेतपद्मासनायै नमः ।
ॐ चाम्पेयकुसुमप्रियायै नमः ।
ॐ वनदुर्गायै नमः ।
ॐ राजराजेश्वर्यै नमः ।
ॐ श्रीदुर्गालक्ष्मीसहित- महासरस्वत्यै नमः ।
श्री वेंकटेश अष्टोत्तर


 ॐ ओंकारपरमर्थाय नमः ।
ॐ नरनारायणात्मकाय नमः ।
ॐ मोक्षलक्ष्मीप्राणकान्ताय नमः ।
ॐ वेंकटाचलनायकाय नमः ।
ॐ करुणापूर्णहृदयाय नमः ।
ॐ टेङ्कारजपसुप्रीताय नमः ।
ॐ शास्त्रप्रमाणगम्याय नमः ।
ॐ यमाद्यष्टाङ्गगोचराय नमः ।
ॐ भक्तलोकैकवरदाय नमः ।
ॐ वरेण्याय नमः ॥ 
ॐ भयनाशनाय नमः ।
ॐ यजमानस्वरूपाय नमः ।
ॐ हस्तन्यस्तसुदर्शनाय नमः ।
ॐ रमावतारमंगेशाय नमः ।
ॐ णाकारजपसुप्रीताय नमः ।
ॐ यज्ञेशाय नमः ।
ॐ गतिदात्रे नमः ।
ॐ जगतीवल्लभाय नमः ।
ॐ वराय नमः ।
ॐ रक्षस्सन्दोहसंहर्त्रे नमः ॥ 
ॐ वर्चस्विने नमः ।
ॐ रघुपुङ्गवाय नमः ।
ॐ धानधर्मपराय नमः ।
ॐ याजिने नमः ।
ॐ घनश्यामलविग्रहाय नमः ।
ॐ हरादिसर्वदेवेड्याय नमः ।
ॐ रामाय नमः ।
ॐ यदुकुलाग्रणये नमः ।
ॐ श्रीनिवासाय नमः ।
ॐ महात्मने नमः ॥ 
ॐ तेजस्विने नमः ।
ॐ तत्त्वसन्निधये नमः ।
ॐ त्वमर्थलक्ष्यरूपाय नमः ।
ॐ रूपवते नमः ।
ॐ पावनाय नमः ।
ॐ यशसे नमः ।
ॐ सर्वेशाय नमः ।
ॐ कमलाकान्ताय नमः ।
ॐ लक्ष्मीसल्लापसंमुखाय नमः ।
ॐ चतुर्मुखप्रतिष्ठात्रे नमः ॥ 
ॐ राजराजवरप्रदाय नमः ।
ॐ चतुर्वेदशिरोरत्नाय नमः ।
ॐ रमणाय नमः ।
ॐ नित्यवैभवाय नमः ।
ॐ दासवर्गपरित्रात्रे नमः ।
ॐ नारदादिमुनिस्तुताय नमः ।
ॐ यादवाचलवासिने नमः ।
ॐ खिद्यद्भक्तार्तिभञ्जनाय नमः ।
ॐ लक्ष्मीप्रसादकाय नमः ।
ॐ विष्णवे नमः ॥ 
ॐ देवेशाय नमः ।
ॐ रम्यविग्रहाय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ लोकनाथाय नमः ।
ॐ लालिताखिलसेवकाय नमः ।
ॐ यक्षगन्धर्ववरदाय नमः ।
ॐ कुमाराय नमः ।
ॐ मातृकार्चिताय नमः ।
ॐ रटद्बालकपोषिणे नमः ।
ॐ शेषशैलकृतस्थलाय नमः ॥ 
ॐ षाड्गुण्यपरिपूर्णाय नमः ।
ॐ द्वैतदोषनिवारणाय नमः ।
ॐ तिर्यग्जन्त्वर्चितांघ्र्ये नमः ।
ॐ नेत्रानन्दकरोत्सवाय नमः ।
ॐ द्वादशोत्तमलीलाय नमः ।
ॐ दरिद्रजनरक्षकाय नमः ।
ॐ शत्रुकृत्यादिभीतिघ्नाय नमः ।
ॐ भुजङ्गशयनप्रियाय नमः ।
ॐ जाग्रद्रहस्यावासाय नमः ।
ॐ शिष्टपरिपालकाय नमः ॥ 
ॐ वरेण्याय नमः ।
ॐ पूर्णबोधाय नमः ।
ॐ जन्मसंसारभेषजाय नमः ।
ॐ कार्तिकेयवपुर्धारिणे नमः ।
ॐ यतिशेखरभाविताय नमः ।
ॐ नरकादिभयध्वंसिने नमः ।
ॐ रथोत्सवकलाधराय नमः ।
ॐ लोकार्चामुख्यमूर्तये नमः ।
ॐ केशवाद्यवतारवते नमः ॥ 
ॐ शास्त्रश्रुतानन्तलीलाय नमः ।
ॐ यमशिक्षानिबर्हणाय नमः ।
ॐ मानसंरक्षणपराय नमः ।
ॐ इरिणांकुरधान्यदाय नमः ।
ॐ नेत्रहीनाक्षिदायिने नमः ।
ॐ मतिहीनमतिप्रदाय नमः ।
ॐ हिरण्यदानग्राहिणे नमः ।
ॐ मोहजालनिकृन्तनाय नमः ।
ॐ दधिलाजाक्षतार्च्याय नमः ।
ॐ यातुधानविनाशनाय नमः ॥ 
ॐ यजुर्वेदशिखागम्याय नमः ।
ॐ वेङ्कटाय नमः ।
ॐ दक्षिणास्थिताय नमः ।
ॐ सारपुष्करिणीतीरे रात्रौ देवगणार्चिताय नमः ।
ॐ यत्नवत्फलसन्धात्रे नमः ।
ॐ श्रीजापधनवृद्धिकृते नमः ।
ॐ क्लींकारजपकाम्यार्थ- प्रदानसदयान्तराय नमः ।
ॐ स्व सर्वसिद्धिसन्धात्रे नमः ।
ॐ नमस्कर्तुरभीष्टदाय नमः ।
ॐ मोहितखिललोकाय नमः ॥ 
ॐ नानारूपव्यवस्थिताय नमः ।
ॐ राजीवलोचनाय नमः ।
ॐ यज्ञवराहाय नमः ।
ॐ गणवेङ्कटाय नमः ।
ॐ तेजोराशीक्षणाय नमः ।
ॐ स्वामिने नमः ।
ॐ हार्दाविद्यानिवारणाय नमः ।
ॐ श्रीवेङ्कटेश्वराय नमः ॥